मुख्यपृष्ठनए समाचारतूफान की तरह फैलकर हवा में उड़ गई कानूनी नोटिस!..कुंभारे-बावनकुले में ‘महाभारत’

तूफान की तरह फैलकर हवा में उड़ गई कानूनी नोटिस!..कुंभारे-बावनकुले में ‘महाभारत’

राजन पारकर / नागपुर

महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक अद्भुत कथा चल रही है। कहते हैं कि नोटिस भेजी गई है, लेकिन उसे देखने का सौभाग्य अभी तक किसी को प्राप्त नहीं हुआ है। मीडिया में घोषणा हो चुकी, बयानबाजी हो चुकी, पर नोटिस स्वयं गुप्त साधना में लीन है। पूर्व राज्यमंत्री तथा बहुजन रिपब्लिकन एकता मंच की अध्यक्षा, अधिवक्ता सुलेखा कुंभारे का स्पष्ट कहना है, ‘मुझे आज तक कोई कानूनी नोटिस प्राप्त नहीं हुई। और माफी? वह तो किसी भी परिस्थिति में नहीं।’
राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने मीडिया को बताया कि उन्होंने कुंभारे को कानूनी नोटिस भेज दी है। पर कुंभारे का कहना है, ‘नोटिस की खबर तो तूफान की तरह पैâली, पर नोटिस खुद हवा में भी नहीं दिखाई दी।’ उन्होंने कहा कि इतने बड़े पद पर बैठे मंत्री द्वारा गलत सूचना पैâलाना सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के विपरीत है। कुंभारे ने चुनौती दी, ‘नोटिस आएगी तो कानूनी भाषा में मजबूत उत्तर दिया जाएगा। हम आंबेडकरवादी भीमसैनिक हैं, लड़ने से पीछे नहीं हटते।’
माफी का मुद्दा दो टूक इनकार

पूर्व राज्यमंत्री तथा बहुजन रिपब्लिकन एकता मंच की अध्यक्षा, अधिवक्ता सुलेखा कुंभारे के बीच बावनकुले ने या तो माफी मांगने या फिर कानूनी लड़ाई के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है। पर कुंभारे ने अत्यंत दृढ़ता से कहा, ‘मैं अपने शब्दों पर अडिग हूं। किसी भी हालत में माफी नहीं मागूंगी।’ कुंभारे ने कामठी नगरपरिषद चुनाव में हुई कथित अनियमितताओं पर अपनी लड़ाई को ही इस विवाद का मूल बताया। उनका आरोप है कि भाजपा प्रत्याशियों द्वारा बड़े पैमाने पर धन का दुरुपयोग हुआ। अग्रवाल भवन और एस. फार्म पर गैरकानूनी गतिविधियां हुर्इं। नकली मतदाता, संदिग्ध लोग और उंगली पर लगाई जानेवाली स्याही मिटाने वाला लिक्विड मौके से जप्त हुआ। उनके शब्दों में, ‘लोकतंत्र में आवाज उठाना हमारा अधिकार है। मतचोरी पर सवाल उठाना कोई अपराध नहीं।’
एफआईआर से पार्थ का नाम गायब क्यों?
कुंभारे ने पुणे के महार वतन भूमि घोटाले का उदाहरण देते हुए कहा, ‘कंपनी में ९९ फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले पार्थ पवार मुख्य आरोपी हैं, फिर भी एफआईआर से उनका नाम क्यों गायब है?’ यह प्रश्न उन्होंने बगैर लाग-लपेट, सीधे सत्ता के केंद्र पर साधा। राजनीति में नोटिस का भ्रम और सत्य का संघर्ष यह पूरा विवाद राजनीति की उस शैली का परिचायक है जहां ‘नोटिस की घोषणा पहले होती है, उसकी यात्रा बाद में।’ कुंभारे नोटिस की प्रतीक्षा में हैं, बावनकुले बयान के मोर्चे पर, मीडिया रोमांच में, और जनता तमाशे में, जबकि नोटिस स्वयं अभी तक अपनी ‘राजनीतिक यात्रा’ पर निकलने का निर्णय ही नहीं कर पाई है।

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