सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देश के संविधान की मूल भावना पर हमला करने का प्रयास किया जा रहा है। सभी संवैधानिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। वंदे मातरम एक प्रेरणादायक गीत है। इस राष्ट्रगीत ने देश की आजादी की नींव रखी। संविधान की रक्षा के लिए फिर से वंदे मातरम का नारा देना होगा। इस तरह की आवाज बुलंद करते हुए शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने कल लोकसभा में जोरदार आवाज उठाई।
वंदे मातरम के डेढ़ सौ साल पूरे होने के अवसर पर लोकसभा में हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए शिवसेना नेता व सांसद अरविंद सावंत ने वंदे मातरम पर जोरदार दलील पेश की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम देशभक्ति से उपजा हुआ गीत है और बंकिमचंद्र चटर्जी पर १८७३ में ब्रिटिश अधिकारियों ने जुल्म किया था, उसके विरोध में उन्हें यह गीत सूझा। सांसद सावंत ने इस बात की भी याद दिलाई कि मातृभूमि ने बंकिमचंद्र के सपने में आकर इस गीत की प्रेरणा दी थी और यह बात उन्होंने अपनी बेटी को बताई थी। सावंत ने कहा कि वंदे मातरम हर भारतीय की रग-रग में है। इसी गीत को गाते हुए नंदुरबार के शिरीषकुमार नाम के एक नौजवान ने अंग्रेजों की गोलियां सीने पर झेलकर शहादत प्राप्त की, तो अरुणा आसफ अली ने ब्रिटिश विरोधी संघर्ष में वंदे मातरम का नारा लगाकर वातावरण बनाया, यह कहते हुए सावंत ने कहा कि वंदे मातरम को लेकर वर्तमान सत्तापक्ष को काफी चिढ़ है। लेकिन सत्ताधारियों की मातृ संस्था (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने कभी भी अपने कार्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज तक नहीं फहराया। इस तरह का तंज भी सांसद अरविंद सावंत ने कसा। यह तंज सत्तापक्ष को खूब चुभा। इस मुद्दे पर सदन में कुछ देर हंगामा भी हुआ।
अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा
डॉ. हेडगेवार और गोलवलकर गुरुजी की कई किताबें मैंने पढ़ी हैं। लेकिन, उनकी किसी भी किताब में वंदे मातरम का साधारण सा जिक्र भी नहीं है। वंदे मातरम का नारा उस समय की कांग्रेस ने दिया और पैâलाया। वंदे मातरम ने हमेशा अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि फिलहाल देश के संविधान की संरचना को ध्वस्त करने का प्रयास जारी है। संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। ऐसे वक्त में वंदे मातरम का नारा देना जरूरी है। अरविंद सावंत ने जोर देते हुए कहा कि देशवासियों को फिर एकजुट होकर वंदे मातरम का नारा देना होगा।
