” मेरा मैं “

ईंट पत्थर के इस जंगल में
“मेरा मैं” कहीं खो गया है?
ढूंढ़ने की कोशिश की जब
देखा ये गहरा सो सा गया है।
वो ‘ मैं ‘ जिसे सालों संभाला,
संवारा… तराशा…सजाया…निखारा,
भीड़ में भी ‘सितारा’ बनाया…
वो सितारा लुप्त हो सा गया है।
इस ‘ मैं ‘ को मैं ना कर जानू,
कोई तो चिन्ह हो जिससे पहचानूं?
चेहरा वही पहचान नयी है
वो परिचित प्यारा, दिल से हमारा
वो ‘ मैं ‘ पीछे छूट गया है
आज जो “मैं” है सामने मेरे
वो “मैं” मेरे कर्मों ने बोया है
वैसे “मैं” का होना ‘गर्व’ की बात है,
पर “मैं ही मैं” के अहंकार से बचना है।
नैन्सी कौर … नई दिल्ली

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