जीवन पुस्तिका कुछ बोझिल हो गई
समझ गई, व्यतीत हुई अवधि
पृष्ठ दर पृष्ठ इसमें जुड़ती रही
स्तब्ध हूं , मैंने अस्सी सावन जी लिए
सावन के साथ पतझड़ भी थे
यह कैसे मैं भूल गई
जिंदगी तो आदेशों कर्तव्यों में बीत गई
पहले चौथाई सावन पतझड़ विहीन थे
शायद चिंता की जगह नहीं थी
वही सबसे अधिक स्मरण है मुझे
फिर सावन पतझड़ घुल-मिल गए
अलग अलग कोई पहचान नहीं
ऐसा नहीं कि मुझे जीवन से आशा नहीं
तन से ढली पर मन से हूं खिली खिली
अब जीवन भागम भाग नहीं
पर मैं भी कहीं ठहरी नहीं
चढ़ गया चश्मा आंखों पर
पढ़ना लिखना अब भी छूटा नहीं
फैशन परस्ती की कायल नहीं
परंतु सबसे अलग दिखती भी नहीं
सादा भोजन खाती हूं
चाट से अब भी परहेज़ नहीं
बहुत दूर के रिश्ते नहीं निभते मुझसे
अपनों से हुई कभी दूर हुई नहीं
उथल पुथल होती रही जीवन में
सुख दुःख से घबराती नहीं
केवल सुर्योदय की लालिमा नही भाती मुझे
सूर्यास्त के क्षितिज को मै आज भी निहारती हूं
कभी कभी बदली निराशा की छाती
मुझे एक किरण आशा की मिल ही जाती
इत्र गुलाब का आज भी लगाती हूं
महक पुरानी ताज़ा कर लेती हूं
दिन दिन तन क्षीण हो रहा
साकार और सार्थक सोच नहीं छोड़ी मैंने
चलती चली जा रही है जिंदगी
मैं भी मस्ती से जी रही ज़िन्दगी।
बेला विरदी।
