भारतीय जनता पार्टी ने ‘वंदे मातरम’ की १५०वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक ‘उत्सव’ यानी ‘इवेंट’ आयोजित करने का फैसला किया था, लेकिन लगता है यह दांव प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा पर उल्टा पड़ गया है। मोदी को अब लग रहा होगा कि लोकसभा में ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा शुरू करके उन्होंने गलती कर दी। ‘वंदे मातरम’ मुद्दे पर पूरे विपक्षी दल ने प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा को खूब खरी-खोटी सुनाई। भाजपा के तथाकथित राष्ट्रवाद की धज्जियां उड़ा दीं। असल में, भाजपा या उसके संघ परिवार का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना-देना नहीं है। इन लोगों के शरीर पर स्वतंत्रता संग्राम में खरोंच तक नहीं आई और यह मजाक ही है कि ये पाखंडी लोग देश को राष्ट्रवाद, देशभक्ति और ‘वंदे मातरम’ पर ज्ञान बांट रहे हैं। १८९६ में कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में जब युवा रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कांग्रेस के मंच से ‘वंदे मातरम’ गाया तो लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नौरोजी सहित पूरी सभा राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत होकर खड़ी हो गई। उसी क्षण से यह गीत राष्ट्र की आत्मा बन गया। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम’ को मंच दिया, उसे प्रतिष्ठा दी, उसे स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम की आवाज बनाया, उसी कांग्रेस से नए जमाने के देशभक्ति के ठेकेदार देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांग रहे हैं। भाजपा के पूर्वज स्वतंत्रता संग्राम में नहीं थे। वे अंग्रेजों और मोहम्मद अली जिन्ना के साथ थे। उन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया और अब सत्ता में आने के बाद, वे देशभक्ति का ज्ञान बांट रहे हैं। भाजपा और संघ परिवार का अचानक ‘वंदे मातरम’ के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा है। यह बंगाल चुनाव के लिए खेला जा रहा एक खेल है। संघ परिवार को देश को बताना चाहिए कि उनकी
शाखाओं में सर्व प्रथम
‘वंदे मातरम’ कब गाया गया था? संघ को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अगर उन्हें ‘वंदे मातरम’ इतना ही प्रिय था, तो उन्होंने अपनी शाखाओं में ‘वंदे मातरम’ के बजाय ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’ को क्यों स्वीकार किया? प्रधानमंत्री मोदी ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा में हमेशा की तरह नेहरू पर टूट पड़े। नेहरू ने मोदी की नींद हराम कर दी है। चाहे वे ट्रंप और पुतिन के साथ कितनी भी मेहमाननवाजी कर लें और उन्हें गले लगाएं, पंडित नेहरू को विश्व नेता के रूप में जो सम्मान और प्रतिष्ठा मिली, वह मोदी को नहीं मिल सकती। उनकी वैश्विक पहचान यह है कि वे एक ऐसी सरकार के प्रधानमंत्री हैं, जो चुनावों में धांधली और पैसे के दम पर चुनी जाती है। ‘वंदे मातरम’ पर बहस में प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष किया। सत्ताधारी सांसद अवाक रह गए। प्रियंका ने कहा, ‘मोदी जितने साल देश के प्रधानमंत्री रहे हैं, उतने साल जवाहरलाल नेहरू देश की आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में रहे।’ नेहरू १७ साल तक प्रधानमंत्री रहे और देश के निर्माण के लिए काम किया। प्रियंका ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मोदी जी, आप नेहरू-नेहरू क्या कर रहे हैं? अगर नेहरू ने इसरो न बनाया होता, तो मंगलयान न उड़ता, अगर डीआरडीओ न बनाया होता तो तेजस लॉन्च न कर पाते। अगर आईआईटी-आईआईएम न बने होते, तो ‘आईटी’ में सबसे आगे न होते। अगर एम्स न बना होता, तो हम कोरोना से वैâसे निपटते? अगर भेल-सेल जैसे सार्वजनिक उपक्रम न होते, तो हम आज का विकसित भारत न देख पाते। आप पंडित नेहरू को दोष क्यों देते हैं? नेहरू ने इसी देश की सेवा करते हुए अंतिम सांस ली।’ प्रियंका गांधी के शब्द इतने प्रभावशाली थे कि मोदी और उनके सांसद उनका जवाब नहीं दे सके। श्रीमती प्रियंका गांधी ने आगे जो कहा, यानी उन्होंने
मोदी को जो चुनौती
दी है वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘मोदीजी, नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी को जो भी कहना है, उन पर आरोप लगाने हैं एक ही बार लगा दीजिए, उस पर जितने घंटे चाहें, चर्चा चलाइए, लेकिन फिर इसे खत्म कर दीजिए और बेरोजगारी, महंगाई, महिलाओं की समस्याओं पर चर्चा कीजिए।’ प्रधानमंत्री मोदी ने ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा में नेहरू पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया, लेकिन यही मोदी अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर राष्ट्रपति भवन में हरे कालीन बिछा रहे थे। यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी। यही मोदी अचानक पाकिस्तान गए और शरीफ के जन्मदिन का केक खाकर वापस आ गए। उस केक और बिरयानी के टुकड़े आज भी मोदी भक्तों के दांतों में अटके दिखते हैं। जहां देश में अनगिनत समस्याएं व्याप्त हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी और उनके अंधभक्त ‘वंदे मातरम’ पर बहस छेड़ रहे हैं। देश की नागरिक उड्डयन सेवा चौपट हो गई है। कई बूढ़े और बीमार लोग हवाई अड्डे पर फंसे हुए हैं। लोगों को लूटा जा रहा है और मोदी संसद में वंदे मातरम पर बहस और चर्चा में व्यस्त हैं। पांच साल पहले, पश्चिम बंगाल चुनाव जीतने के लिए मोदी ने दाढ़ी बढ़ाकर रवींद्रनाथ टैगोर की छवि धारण कर ली थी। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। अब, उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए ‘वंदे मातरम’ और बंकिमचंद्र को चुना है, लेकिन मोदी की खुद की फजीहत हो गई। प्रियंका गांधी ने तो मुस्कुराते हुए मोदी के जख्मों पर नमक भी छिड़का है। देशभक्ति का बाजार और व्यापार प्रधानमंत्री मोदी और उनके लोगों का खेल है। चूंकि ‘वंदे मातरम’ पवित्र है इसलिए वे इस मामले में धोखा खा चुके हैं। भगत सिंह से लेकर अशफाकउल्लाह खान तक अनगिनत क्रांतिकारी ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष करते हुए फांसी पर चढ़ गए। उनमें मोदी की पार्टी का एक भी पूर्वज नहीं था। उनका ‘वंदे मातरम’ पर ज्ञान बांटना अतिशयोक्ति ही है।
