राजन पारकर / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक अजीब-सा अध्यात्म पैâल गया है, जिसमें संविधान की मौलिक भावना को तिलांजलि देकर ‘१० फीसदी का जप’ किया जा रहा है। जैसे एलओपी (विरोधी पक्ष नेता) का पद कोई मंदिर का प्रसाद हो और उसे लेने से पहले पंडितजी ने शर्त लगा दी हो, ‘पहले १० फीसदी दो, तभी प्रसाद लो!’ सबसे मजेदार बात यह है कि भारतीय संविधान में कहीं भी ‘१० फीसदी का अनिवार्य नियम’ लिखा नहीं। अनुच्छेद ९३ और १७८ में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का जिक्र है, पर एलओपी का तो नाम तक नहीं। लेकिन हमारे राज्य के बुद्धिमान ज्ञानी संविधान में यह १० फीसदी ऐसे ढूंढ रहे हैं, जैसे बेरोजगार युवक नौकरी ढूंढता हो। बहुत खोजेगा, पर मिलेगा कुछ नहीं।
१९६९ के लोकसभा स्पीकर के निर्देश को कुछ लोग कानून समझकर पकड़ बैठे हैं। अरे साहब, वह तो सिर्फ एक परंपरा थी, जैसे बारात में दूल्हे को पहले जलेबी खिलाना, कोई कानून नहीं। लोकसभा सचिवालय ने २०१४ में साफ कर दिया था कि एलओपी के लिए किसी ‘टक्केवारी की शर्त’ का अस्तित्व ही नहीं। मगर हमारे यहां कुछ लोग इसे ‘लोकशाही का गणित’ मानकर घुमा-फिरा रहे हैं। अब जरा १९७७ के कानून पर नजर डालिए, यह कानून कहता है कि एलओपी वही होगा जो सदन में ‘संख्याबल से सबसे बड़ा विपक्ष’ हो। यहां भी १० फीसदी का भूत कहीं नहीं। पर महाराष्ट्र में १०फीसदी का भूत न केवल जीवित है, बल्कि सदन में घूम-घूमकर लोगों को डराता भी है! सर्वोच्च न्यायालय भी कितनी बार याद दिला चुका, ‘विपक्ष लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है।’ लेकिन यहां तो लगता है कि स्तंभ को भी ‘१० फीसदी सीमेंट’ चाहिए, तभी वह खड़ा माना जाएगा। और रही बात अध्यक्ष महोदय के विवेकाधिकार की, सोमनाथ चटर्जी ने साफ लिखा था कि १० फीसदी न हो, तब भी स्पीकर चाहे तो एलओपी की मान्यता दे सकता है और लोकतंत्र के हित में देना चाहिए। अत: मा. अध्यक्ष महोदय, कृपया १० फीसदी का चश्मा उतारकर लोकतंत्र की साफ दृष्टि से देखिए और सदन के सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को लीडर ऑफ अपोजिशन घोषित करिए। क्योंकि जनता को १०० फीसदी लोकतंत्र चाहिए, न कि १० फीसदी वाली राजनीति।
