जेदवी
भारत की महत्वाकांक्षी वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की नई पहचान और निजी क्षेत्र की दक्षता का प्रतीक बताकर पेश किया गया था। दावा था कि यह परियोजना भारतीय रेलवे को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी और यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं देगी। लेकिन २०२६ की दहलीज पर खड़ी यह परियोजना अब उपलब्धियों से ज्यादा सवालों के कारण चर्चा में है। देरी, बढ़ती लागत और सरकारी इकाइयों से पिछड़ना, इन सबने इसके निजी मॉडल पर संदेह गहरा दिया है।
प्रोटोटाइप अधूरा, वादे अधूरे
टीटागढ़ रेल सिस्टम्स और बीएचईएल के कंसोर्टियम को यह परियोजना वर्ष २०२३ में सौंपी गई थी। तय समयसीमा के अनुसार, पहला प्रोटोटाइप जून, जुलाई २०२५ तक पटरी पर आना था। लेकिन अब इसे सितंबर २०२६ तक टाल दिया गया है, यानी लगभग ९ से १२ महीने की देरी।
रेलवे सूत्रों के अनुसार, कोचों की संख्या १६ से बढ़ाकर २४ करने और डिजाइन में बार-बार बदलाव के कारण निर्माण प्रक्रिया बार-बार प्रभावित हुई। यह देरी निजी क्षेत्र की उस ‘तेज कार्यशैली’ पर सवाल खड़े करती है, जिसका हवाला देकर इस परियोजना को सौंपा गया था।
सरकारी बनाम निजी: दावा कौन सही?
विडंबना यह है कि जिस निजी स्लीपर वंदे भारत को भविष्य की ट्रेन बताया जा रहा है, उससे पहले सरकारी इकाइयों की आईसीएफ और बीईएमएल द्वारा विकसित स्लीपर वंदे भारत जनवरी २०२६ में गुवाहाटी, कोलकाता रूट पर दौड़ने वाली है। यह स्थिति निजीकरण के उस तर्क को कमजोर करती है, जिसमें कहा गया था कि निजी कंपनियां सरकारी ढांचे से कहीं बेहतर और तेज काम करती हैं। सवाल उठता है कि अगर सरकारी प्रणाली पहले ट्रेन उतार रही है, तो निजी मॉडल की श्रेष्ठता आखिर कहां है?
पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब २४,००० करोड़ रुपए है। इसमें लगभग ९,६०० करोड़ रुपए निर्माण लागत और १३,४०० करोड़ रुपए ३५ वर्षों के रखरखाव पर खर्च होने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रखरखाव की लागत का निर्माण लागत से अधिक होना रेलवे के लिए दीर्घकालिक वित्तीय जोखिम पैदा कर सकता है। इतने लंबे समय तक निजी कंपनी पर निर्भरता, रेलवे की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है।
प्रस्तावित किराया भी चिंता का विषय है-
थर्ड-एसी:२,३००
सेकंड-एसी: ३,०००
फर्स्ट एसी:३,६००
यह किराया कई मौजूदा प्रीमियम ट्रेनों के बराबर है, जबकि नई ट्रेन की विश्वसनीयता और मेंटेनेंस रिकॉर्ड अभी पूरी तरह परखा जाना बाकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह ट्रेन मध्यम वर्ग के लिए है या सिर्फ प्रीमियम यात्रियों के लिए?
क्षमता बनाम जमीनी जरूरत
एक वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में लगभग ८२३ यात्रियों की क्षमता होगी। भारत जैसे देश में, जहां लंबी दूरी की ट्रेनों में भारी भीड़ रहती है, यह क्षमता सीमित मानी जा रही है। ऊंचा किराया, सीमित सीटें और चुनिंदा रूट, यह मॉडल जन-परिवहन से अधिक ब्रांड प्रोजेक्ट जैसा प्रतीत होता है।
निजी निर्माण, सार्वजनिक जोखिम
यदि भविष्य में तकनीकी खामियां सामने आती हैं, रखरखाव लागत बढ़ती है या निजी कंपनी वित्तीय दबाव में आती है, तो अंतिम जिम्मेदारी भारतीय रेलवे पर ही आएगी। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जोखिम निजी का, लेकिन बोझ सार्वजनिक क्यों?
रूट और ट्रायल
मुंबई-अहमदाबाद सेक्शन पर वंदे भारत स्लीपर के प्रोटोटाइप रैक का सफल ट्रायल रन नवंबर २०२४ में किया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती रूट्स में मुंबई से दिल्ली या मुंबई से लखनऊ जैसे लंबी दूरी के मार्ग शामिल हो सकते हैं। रेल मंत्रालय ने दावा किया है कि २०२६ तक देश के लगभग सभी राज्यों को वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें शुरू हो जाएंगी। वंदे भारत स्लीपर फिलहाल तेज रफ्तार के सपने से ज्यादा धीमी फाइलों की हकीकत बनती दिख रही है। देरी, बढ़ती लागत, सरकारी इकाइयों से पिछड़ना और आम यात्री से दूरी ये सभी संकेत बताते हैं कि यह परियोजना अभी प्रचार में आगे और प्रदर्शन में पीछे है।
अब असली परीक्षा २०२६–२७ में होगी, जब यह ट्रेन वास्तव में पटरी पर उतरेगी। तभी तय होगा कि वंदे भारत स्लीपर भारतीय रेलवे का भविष्य बनेगी या एक महंगा प्रयोग साबित होगी।
