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संपादकीय : मोदी का हर्षोन्माद!

प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को कैसा आचरण नहीं करना चाहिए, यह पाठ श्री नरेंद्र भाई मोदी बार-बार पढ़ाते रहते हैं। बुधवार की शाम को दिल्ली स्थित निवास पर शायद मोदी को हर्षोन्माद ही हो गया और उन्होंने सोशल मीडिया पर संदेश डाला, ‘उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक जैसे चार बड़े राज्यों में २८ सीटों पर विधान परिषद के चुनाव हुए। चुनाव मतपत्र पर कराए गए। कांग्रेस कितनी सीटों पर विजयी हुई, यह कोई बता सकता है क्या?’ प्रधानमंत्री का अत्यधिक आनंद भाजपा की जीत में नहीं, बल्कि कांग्रेस को सीट न मिलने में है। यह एक प्रकार का बचकानापन है। भारत जैसे महान देश के प्रधानमंत्री को ऐसा आचरण शोभा नहीं देता। विधान परिषद की २८ सीटों में भाजपा को सर्वाधिक सीटें मिलीं, यह सच है, परंतु मोदी को अपने ‘एक्स’ पोस्ट में यह भी बताना चाहिए था कि जिस वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट पर भाजपा की करारी हार हुई है। आगरा, लखनऊ की सीट पर भी भाजपा हारी है। इस हार से भी उन्हें आनंद हुआ हो तो वे इसे सार्वजनिक करें। मध्य प्रदेश, कर्नाटक पर यहां चर्चा करने का अर्थ नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र के विधान परिषद के परिणामों ने भाजपा के उड़ते घोड़े को निश्चित रूप से जमीन पर ला दिया होगा। अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से किरण सरनाईक विजयी हुए। उनके शिंदे गुट के होने का दावा किया जाता है, लेकिन सरनाईक को इसे स्वीकार करना चाहिए। शिक्षकों के वोट किसी एक दल के ही होते हैं, ऐसा नहीं माना जा सकता। पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के कौस्तुभ गावड़े जीते। वे खुद कोई शिक्षक नहीं हैं, बल्कि एक बड़े शिक्षण संस्थान के संचालक हैं। शिक्षकों का प्रतिनिधि बनाकर विधानमंडल में किसे भेजना है, यह
शिक्षण संस्थान और सम्राट
तय करते हैं। संस्थान चालकों की चोटियां सरकार के हाथ में होने के कारण संस्थान चालक अपने-अपने संस्थानों के शिक्षकों को इस चुनाव में झोंक देते हैं। फिर इस बार यह खुला आरोप लगा कि पुणे के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में प्रति वोट दस हजार का भाव लगाया गया था। इसके अलावा शिक्षकों की शाम की पार्टियों की पुख्ता व्यवस्था थी। इस तरह से शिक्षकों का मतदान होकर उनके प्रतिनिधि कहलाने वाले यदि विधानमंडल पहुंच रहे हैं, तो उनसे शिक्षकों के और शिक्षा क्षेत्र के कौन-से प्रश्न हल होंगे? उसी पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार स्मिता जाधव की हार हुई। इस सीट को भाजपा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था। देवेंद्र फडणवीस ने स्मिता जाधव के प्रचार में और जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन ‘ओरिजिनल’ राष्ट्रवादी कांग्रेस की हर्षदा देशमुख-जाधव इस वीरांगना ने भाजपा उम्मीदवार को मात दी। पुणे स्नातक का परिणाम प्रधानमंत्री मोदी के कानों तक पहुंचा नहीं क्या? पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी के पास खाली समय था। इसलिए महाराष्ट्र के स्नातक शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के प्रचार कार्य के लिए उन्हें पुणे, मराठवाड़ा, नागपुर में आ जाना चाहिए था। पुणे निर्वाचन क्षेत्र के सुशिक्षित मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को नकार दिया है। यह तो भाजपा का गढ़ माना जाता है। हर्षदा देशमुख-जाधव को सवा लाख वोट मिले हैं। मराठवाड़ा के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी १८ साल तक विधायकी भोगने वाले और हमेशा पलटूराम के रूप में बदनाम चव्हाण पराभूत हुए। चव्हाण भाजपा, शिंदे और अजीत पवार कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार थे। चव्हाण की हार ओरिजिनल राष्ट्रवादी गुट के उम्मीदवार प्रताप पाटील ने की। यानी मराठवाड़े के
हजारों स्नातकों ने भी
‘मोदी’ को नकार दिया है और सतीश चव्हाण के हारने का आनंद मराठवाड़ा में मनाया जा रहा है।
महायुति के अब्दुल सत्तार आदि कई लोग खुले तौर पर सतीश चव्हाण की हार के लिए पसीना बहा रहे थे। अब मुख्य विषय नागपुर का बचा है। नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हराकर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने एक बार फिर तिरंगा फहराया है। नागपुर के ‘संघ’ गढ़ में लगातार दो बार भाजपा की हार हुई। नागपुर का चुनाव संघर्षपूर्ण रहा और दूसरे दौर की वोटों की गिनती के बाद कांग्रेस के वंजारी विजयी हुए। मुख्यमंत्री फडणवीस को यह जबरदस्त झटका है। बैलेट पेपर पर चुनाव होने से यह सब हो सका। भाजपा अयोध्या में हारी, लखनऊ में हारी, काशी-बनारस में हारी और संघ मुख्यालय में भी हारी। फिर कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई, इसका आनंद किस बात का मना रहे हैं? विधान परिषद के परिणाम जनमत नहीं हैं। इसके बावजूद महाराष्ट्र के लाखों स्नातकों ने मोदी-फडणवीस को नकार दिया है। ‘२८’ सीटों का हिसाब प्रधानमंत्री मोदी लगाने बैठे हैं। भरपूर खाली और फालतू समय होने के ये लक्षण हैं। देश के सामने आज कई चुनौतियां हैं। मणिपुर सुलग रहा है, अरुणाचल में चीन ने पैर पसार लिए हैं। अर्थव्यवस्था बैठ गई है। केंद्र के मंत्री यौन पिपासु एपस्टीन के साथ हाथ मिलाते नजर आए हैं। महाराष्ट्र में सूखा पड़ा है। इस पर टिप्पणी करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के पास समय नहीं है, लेकिन चार राज्यों की २८ विधान परिषदों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली, इस बात से उन्हें हर्षोन्माद हो गया है। बहरहाल, मोदी हर्षोन्माद से आनंदित हो रहे हैं, तब नागपुर में भाजपा को मात देकर कांग्रेस ने विजय प्राप्त की है। तब से मोदी मौन हैं।

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