सैयद सलमान, मुंबई
इजरायल के हालिया चुनाव से एक बात साबित हुई कि अरब-मुस्लिम समाज अब राजनीति के हाशिए पर खड़ा मूक दर्शक नहीं रहा। वह सत्ता के समीकरण बदलनेवाली ताकत भी बन सकता है। गाजा में तबाही, फिलिस्तीनियों की दुर्दशा और अरब नागरिकों के साथ भेदभाव के बीच रआम और जॉइंट लिस्ट के प्रदर्शन ने इस बदलाव को रेखांकित किया है।
७५ फीसद मतदान
वोटों की गिनती के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, दोनों पार्टियां मिलकर लगभग १९ सीटें हासिल कर सकती हैं। यदि ये अनुमान सही साबित होते हैं तो इजरायली संसद में अरब प्रतिनिधित्व एक नए स्तर पर पहुंचेगा। यह उन नागरिकों की राजनीतिक प्रतिक्रिया है, जो लंबे समय से असमानता और उपेक्षा का सामना करते आए हैं।
इजरायल के अरब-मुस्लिम नागरिकों की स्थिति विरोधाभासों से भरी है। वे इजरायल के नागरिक हैं, लेकिन उनकी भाषा, संस्कृति और पारिवारिक रिश्ते फिलीस्तीन से जुड़े हैं। गाजा में बच्चों की मौत, अस्पतालों का विनाश, विस्थापन और भुखमरी उनके लिए कहीं दूर घटी घटनाएं न होकर, अपने समाज की साझा पीड़ा हैं। ऐसे में उनके लिए मतदान सिर्फ लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं थे, बल्कि अपनी आवाज बुलंद करने का माध्यम भी बने।
अरब पार्टियों के समर्थन वाले इलाकों में ७५ प्रतिशत से अधिक मतदान की खबरें इस बात का सबूत हैं कि मुस्लिम समाज ने राजनीतिक भागीदारी को गंभीरता से लिया है। जिस समाज की मांगों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता रहा, उसने अपने वोट से स्पष्ट कर दिया कि उसकी भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता। गाजा की त्रासदी ने इस असंतोष को और धार दी है।
चुनावी अनुमानों ने बेंजामिन नेतन्याहू के लिए सत्ता की राह कठिन कर दी है। पिछली संसद में उनके गठबंधन के पास ६८ सीटें थीं, लेकिन इस बार उन्हें ५३ सीटें मिलती दिख रही हैं। दूसरी ओर, गदी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्ष भी सरकार बनाने के लिए जरूरी ६१ सीटों तक पहुंचता किसी हाल में नहीं दिख रहा। ऐसे में अरब पार्टियों का समर्थन निर्णायक हो सकता है। विपक्ष को नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए उनकी मदद की जरूरत पड़ सकती है, जबकि नेतन्याहू अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से इनकार कर चुके हैं।
गाजा त्रासदी का प्रभाव
यही स्थिति इजरायली लोकतंत्र की एक बुनियादी विडंबना बनकर उभरी है। अरब मतदाता सरकार बनाने के लिए जरूरी साबित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सत्ता में बराबरी का भागीदार स्वीकार करने में राजनीतिक नेतृत्व हिचकता है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगली सरकार किसकी बनेगी, बल्कि यह भी है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था अपने अरब नागरिकों को कितना समान स्थान देने को तैयार है।
नेतन्याहू की राजनीति में अरब मतदाताओं को खतरे के रूप में पेश करने की कोशिश भी इसी विरोधाभास का हिस्सा है। किसी भी समाज के वोट को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय खतरे की तरह दिखाना उसकी नागरिक हैसियत पर सवाल खड़े करता है। इस चुनाव में अरब मतदाताओं ने पीछे हटने के बजाय अपनी भागीदारी से जवाब दिया। रआम के नेता मनसूर अब्बास ने अरब अवाम की उपेक्षा का मुद्दा उठाया है, जबकि जॉइंट लिस्ट ने नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की कोशिशों में सहयोग का संकेत दिया है। इससे स्पष्ट है कि अरब पार्टियां अब महज विरोध दर्ज कराने के बजाय नीतिगत फैसलों पर असर डालना चाहती हैं।
गाजा की त्रासदी इस चुनाव को व्यापक राजनीतिक अर्थ भी देती है। इजरायल के अरब-मुस्लिम नागरिक मतदान के जरिए सरकार को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि गाजा और पश्चिमी किनारे के अधिकांश फिलिस्तीनी इस चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते। इस अंतर से राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। इसलिए अरब मतदाताओं की चिंताएं स्थानीय नागरिक सुविधाओं तक सीमित नहीं हैं। युद्धविराम, मानवीय सहायता, फिलिस्तीनियों की गरिमा और स्थायी राजनीतिक समाधान भी उनकी प्राथमिकताओं का हिस्सा हैं।
सत्ता में भागीदारी का हक!
आगे तीन संभावनाएं हैं। अरब पार्टियां किसी गठबंधन को बाहर से समर्थन दें, सीमित नीतिगत समझौतों के जरिए अपनी मांगें मनवाएं या दोनों बड़े राजनीतिक खेमों की दूरी देश को फिर गतिरोध और नए चुनाव की ओर ले जाए। परिणाम चाहे जो हो, अरब-मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा।
इस चुनाव की असल कसौटी सीटों की संख्या से आगे है। क्या इजरायल का राजनीतिक नेतृत्व अरब नागरिकों को सिर्फ चुनावी गणित का हिस्सा मानेगा या समान अधिकारों और सत्ता में भागीदारी का हक भी देगा? क्या गाजा की त्रासदी सिर्फ चुनावी भाषणों में दोहराई जाएगी या युद्धविराम, मानवीय सहायता और फिलिस्तीनी अधिकारों से जुड़ी नीतियों में ठोस बदलाव आएगा?
अरब-मुस्लिम मतदाताओं ने अपनी राजनीतिक ताकत का संकेत दे दिया है। अब परीक्षा इजरायली राजनीति की है कि वह इस आवाज को स्वीकार करती है या फिर उसे सत्ता के दरवाजे पर ही रोक देती है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)
