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सम-सामयिक : चुनावों के बाद भी भारत के लिए दूसरा पाकिस्तान बना रहेगा बांग्लादेश

संजय श्रीवास्तव

चुन-चुनकर हिंदुओं की हत्या, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार और पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चलते हुए अपनी क्रिकेट टीम को भारत में टी-२० विश्वकप के लिए न भेजने का पैâसला। बांग्लादेश भारत के लिए पूरी तरह से दूसरा पाकिस्तान बन गया है और जिस तरह की हवा बह रही है, उससे लगता यही है कि आगामी चुनावों के बाद भी स्थिति कोई खास बदलने वाली नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि नई दिल्ली बांग्लादेश को लेकर अपने पारंपरिक रवैये को बदले।
`एंटी इंडिया’
उम्मीद है कि बांग्लादेश में २० फरवरी २०२६ तक एक चुनी हुई सरकार सत्ता संभाल ले। ये चुनाव बहुत पहले होने चाहिए थे, २०२४ को छात्रों के आंदोलन के बाद हसीना जब इस्तीफा दे भारत भाग आर्इं और ८ अगस्त २०२४ को मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ तो उसने ६ महीने के भीतर चुनाव कराने का वादा किया था। खैर, शायद इस देरी ने भी बांग्लादेश को कुछ सियासी सबक सिखाए हों और आगामी चुनावों में वह इस सबक का इस्तेमाल भी करे, लेकिन शायद ही देर आयद, दुरुस्त आयद हो। जाहिर है कि इन चुनावों के नतीजों का सबसे ज्यादा असर बांग्लादेश और बांग्लादेशियों पर होगा, लेकिन चीन और पाकिस्तान की नजरें भी इस ओर हैं तो हमारी भी। सभी चाहते हैं कि बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हो और वहां हिंसा रुके। हमारी चाहत है कि वहां हिंदुओं की सुरक्षा देने वाली स्थिर सरकार बने, जिससे सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और पूर्वोत्तर की स्थिरता को प्राथमिकता मिले, कपास आयात जैसे मसले और तीस्ता जल बंटवारे पर ठोस बातचीत हो सके। हम इस चुनाव को महज सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं देख रहे, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन के एक निर्णायक मोड़ के बतौर ले रहे हैं। उधर, चीन की मंशा है कि उसकी आर्थिक घुसपैठ निरंतर रहे और उसके बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट्स निर्बाध रहें।
पाकिस्तान ‘एंटी-इंडिया’ भावना को मजबूत बनानी वाली और १९७१ के मुद्दों पर नरम रुख रखने वाली सरकार चाहता है। अमेरिका-यूरोप की निगाह ऐसी सरकार पर है, जो यूनुस के सुधारों का समर्थन करती हो। सबसे ज्यादा अपेक्षाएं बांग्लादेशियों की हैं। वे नई सरकार से आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार पर रोक, महंगाई पर नियंत्रण, बेरोजगारी दूर करना, बिजली की बेहतर आपूर्ति, संविधान में सुधार, कानून व्यवस्था की बहाली तथा अवामी लीग के अत्याचारों पर जवाबदेही चाहते हैं। धार्मिक कट्टरता या वैचारिक बहसें यहां आम मतदाता के लिए दोयम दर्जे के मुद्दे हैं। बेशक यह चुनाव राजनीतिक रूप से अंतरिम सरकार के सुधारों को परखेगा और कूटनीतिक तौर पर भारत, चीन व पाकिस्तान की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करेगा, लेकिन जो पार्टियां चुनावी मैदान में हैं, उनके इतिहास, प्रवृत्ति, तौर-तरीके तथा मौजूदा सियासी समीकरणों और देश के हालात को देखते हुए भारत और बांग्लादेशियों की इच्छाएं, अपेक्षाएं पूरी होती नहीं दिखती हैं।
आसार
बांग्लादेश में चालीस से अधिक पंजीकृत पार्टियां चुनाव मैदान में होने के बावजूद मुकाबला १० दलों वाले बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी गठबंधन और बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी में ही हैं। शेख हसीना की अवामी लीग चुनाव से बाहर है तो मामला द्विदलीय हो गया है। जमात-ए-इस्लामी का मुख्य मुद्दा है- इस्लामी कानून लागू करवाकर धार्मिक न्याय व शासन स्थापित करना, सेकुलर और समाजवाद को हटाना और पश्चिमी प्रभाव का विरोध। पहली नजर में ही यह बांग्लादेश के कुछ कट्टरपंथियों और पाकिस्तान के अलावा किसी और की अपेक्षा पूरी करेगी, इसमें संदेह है। एनसीपी यानी नेशलिस्ट सिटीजन पार्टी, जो पिछले साल ही युवा विद्रोह के दौरान बनी है। फिलहाल, भारी खटपट के बावजूद जमात-ए-इस्लामी के साथ है और खुद को ‘तीसरी ताकत’ के रूप में पेश कर रही है, जबकि बीएनपी उसे महज वोट-कटवा मानती है। उसका लक्ष्य है, प्रखर राष्ट्रवाद, आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार विरोध, संस्थागत सुधार और युवा राजनीति को बढावा देना। बीएनपी का भी वादा राष्ट्रवाद, आर्थिक सुधार, सत्ता विकेंद्रीकरण है। एनसीपी अपेक्षाकृत नया और सीमित प्रभाव वाला अनुभवहीन उत्साही भारत विरोधी दल है इसलिए उससे कोई अपेक्षा पालना बेकार ही है।
वैसे भी बांग्लादेश में वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाली एनसीपी को जमात-ए-इस्लामी की बी टीम भी कहा जा रहा है और वह जमात-ए-इस्लामी की छोड़ी हुई १९ सीटों पर ही लड़ रही है। अजब यह है कि जमात-ए-इस्लामी पिछले दिनों बीएनपी के साथ आने की मंशा जाहिर कर चुकी है, बीएनपी इसके लिए उत्सुक नहीं है, फिर भी ऐसे में गठबंधनों का चेहरा चुनाव या उसके बाद बदल सकता है। सरकार की सूरत कुछ यूं बनती है या तो बीएनपी अकेले सरकार बनाए या फिर वह जमात-ए-इस्लामी से सरकार बनाने में सहायता ले, पर इसे औपचारिक गठबंधन का नाम न दे।
अगर बीएनपी ज्यादा सीटें लाती हैं तो एनसीपी जमाते इस्लामी का साथ छोड़कर उससे हाथ मिला ले, वैसे इसके आसार कम हैं। हालांकि, राजनीति में क्या नहीं हो सकता।
बैसाखी
चुनाव में सबसे अहम है कि चुनाव से दूर अवामी लीग के मतदाता किधर जाते हैं। अवामी लीग के वोटरों की विचारधारा जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ तो है, पर उसके वोटरों का छोटा हिस्सा धार्मिक रुझान को समर्थन देते हुए ग्रामीण इलाकों में उसकी ओर जाएगा ही, लेकिन वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अगर जमात-ए-इस्लामी हथियाने में कामयाब रहता है तो वह बहुमत के आस-पास नजर आ सकती है। लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के बीएनपी को सत्ता-विरोधी माहौल का फायदा मिल सकता है। १७ साल बाद स्वदेश लौटे खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान को जिया की मौत के बाद भावनात्मक लाभ मिल सकता है, उन्हें परिणाम को प्रभावित कर सकने वाला जनसमर्थन भी है और उन्हें प्रधानमंत्री के बतौर पेश भी किया जा रहा है। हालांकि, अनुपस्थिति और विवादित छवि उन्हें ‘गेम-चेंजर’ से ज्यादा ‘पोलराइजिंग पैâक्टर’ बनाती है। अगर सर्वे सही है कि बीएनपी ३३ फीसद तो जमात २९ प्रतिशत और नेशनल सिटिजन पार्टीr १६ फीसद मतदाताओं की पसंद हैं। युवाओं में भी पहली पसंद बीएनपी और दूसरी जमात-ए-इस्लामी है।
भले ही बीएनपी अभी आगे दिखती हो, पर जमात-ए-इस्लामी भी बहुत पीछे नहीं है। उसने खुद को पुनर्गठित कर मजबूत दावेदारी पेश कर रही है। संगठनात्मक अनुशासन और स्पष्ट फोकस के मामले में वह आगे है। कांटे की लड़ाई में बीएनपी बहुमत के नजदीक पहुंच सकती है, लेकिन स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में उसे जमात या एनसीपी की बैसाखी चाहिए होगी। चुनाव के बाद या उससे पहले अप्रत्याशित गठबंधन, एनसीपी की खींचतान और टूट, युवा और शहरी मतदाता का रुझान, सोशल मीडिया, प्रभावित नैरेटिव, अवामी लीग के मतदाताओं का प्रत्याशित और एकमुश्त वोट ट्रांसफर या युवा मतदाता उन्माद या फिर तकरीबन १० फीसदी हिंदू वोटरों का कुछ सीटों पर रुझान, बेहद कम मतदान वगैरह चुनावी नतीजों को या सरकार के गठन को लेकर चुनावी विश्लेषकों को चौंका सकते हैं।
एक कुंआ, एक खाईं
भारत चाहेगा कि जमात-ए-इस्लामी सत्ता में न आए, उसकी सरकार बनने का मतलब है कि बांग्लादेश की बर्बादी और भारत विरोधी ताकतों का मजबूत होना। यह मान भी लिया जाए कि सत्ता में आने के बाद शरीयत कानून लागू कर महिलाओं और अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने वाली पाकिस्तान की कठपुतली जमात-ए-इस्लामी सत्ता से दूर रह जाएगी, पर इस बात की कोई गारंटी नहीं कि बीएनपी इतनी बंपर जीत हासिल कर ले कि उसे न तो धर्मांध जमात-ए-इस्लामी की जरूरत पड़े और न ही मुखर भारत विरोधी नेशनल सिटिजन पार्टी की। अगर बीएनपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए, तब भी उसके भीतर धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाले तत्व हैं, जिनकी राय भारत के बारे में बेहतर नहीं है। रहमान का भी नारा है, ‘न दिल्ली, न पिंडी’। जमात के मुकाबले बीएनपी को एक अधिक उदार और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखना दिवास्वप्न है। भारत के लिए बीएनपी ‘दो बुरे विकल्पों में से कम बुरा’ चुनने की मजबूरी जैसा है। ऐसे में बांग्लादेश में किसी पार्टी या गठबंधन की सरकार बने भारत ही नहीं बंग्लादेशियों की सकारात्मक क्रांतिकारी बदलाव के उम्मीदों पर खरी नहीं उतरने वाली।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार हैं)

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