-डिजिटल इंडिया में यात्री सुरक्षा पर गंभीर सवाल
जेदवी / मुंबई
मुंबई की पहली अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन-३ एक्वा मेट्रो तेज रफ्तार और आधुनिक सुविधा का दावा करती है, लेकिन जमीन के नीचे उतरते ही यात्री मोबाइल नेटवर्क से पूरी तरह कट जा रहे हैं। आलम यह है कि ३३.५ किमी लंबी इस लाइन में वर्ली से कोलाबा तक ज्यादातर स्टेशन और सुरंगें ‘डेड जोन’ बन चुकी हैं। ऐसे में यात्रा के दौरान डिजिटल दुनिया से कटे यात्री एक-दूसरे का मुंह निहार रहे हैं।
बड़े-बड़े ऑपरेटर हुए फेल
फिलहाल लाइन-३ में सिर्फ वीआई और बीएसएनएल को कुछ हिस्सों में कमजोर नेटवर्क मिला है। जियो और एयरटेल जैसे बड़े ऑपरेटर पूरी तरह बाहर हैं, जिससे यात्रियों के विकल्प और उपभोक्ता अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। इसे ‘डिजिटल डिटॉक्स’ कहना मजाक हो सकता है, लेकिन यात्रियों के लिए यह मजबूरी है।
कीमत चुका रही है आम जनता
यात्रियों का सवाल सीधा है कि दो संस्थाओं के विवाद की कीमत आम जनता क्यों चुकाए? मोबाइल कनेक्टिविटी कोई लग्जरी नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन में बुनियादी सुरक्षा सुविधा है। दुनिया के बड़े शहरों में यह मानक है।
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि समाधान नहीं निकला तो आने वाली अंडरग्राउंड लाइनों में भी यही हाल होगा। एक्वा मेट्रो तेज जरूर है, लेकिन मोबाइल नेटवर्क के बिना यह सफर यात्रियों के लिए असुरक्षित और अधूरा ही रहेगा।
न कॉल, न मैसेज, न इंटरनेट
यात्री मेट्रो में बैठते ही डिजिटल दुनिया से कट जाते हैं। परिवार, दफ्तर या किसी आपात स्थिति में संपर्क का कोई साधन नहीं रहता। यही सबसे बड़ा खतरा है। मुंबई सेंट्रल से मरोल तक रोज सफर करने वाले सचिन पाठक कहते हैं, ‘मेट्रो में रहते हुए अगर कोई इमरजेंसी हो जाए, तो हम पूरी तरह असहाय हैं।’
असल समस्या है शुल्क विवाद
असल समस्या तकनीकी नहीं, बल्कि एमएमआरसीएल और टेलीकॉम कंपनियों के बीच शुल्क विवाद है। एमएमआरसीएल ने इन-बिल्डिंग सॉल्यूशन का १२ साल का ठेका एसेस इंडिया को दिया है। टेलीकॉम कंपनियों का आरोप है कि उनसे अत्यधिक और अव्यावहारिक शुल्क मांगा जा रहा है। सीओएआई ने इन दरों को ‘एकाधिकारवादी’ बताया है। वहीं एमएमआरसीएल का तर्क है कि नॉन-फेयर रेवेन्यू के बिना मेट्रो चलाना मुश्किल होगा।
