एड. राजीव मिश्र
मुंबई
जबसे चुनाव के घोषणा भई है तबसे पूरे वार्ड में एक से एक बिकास-मूर्ति घुमि रहें हैं। झकाझक कुर्ता-पैजामा में प्रत्याशी गली में अइसन निकरत हैं मानो ई नही होते तो यहि सृष्टि से सेवाभाव कबके गायब होइ गवा होत। सामने से जे कबहुँ देखिके मूड़ी दूसरी ओर घुमाय लेत रहे, उ अब अपने गाड़ी से उतरि-उतरि लोगन के गोड़ लागि रहें हैं। परचा दाखिल करय से पहिले हर नेता अपने चेलन से कहि दिए हैं कि एक-एक चेला कम से कम दस गाड़ी लेइ आयी। वैâमरा वाले फिट कइ दिए गए हैं। केउ वैâमरा से तो केउ मोबाइल से सब झकझोरि के लगे हैं। सत्यनारायण से लइके भगवान के पालकी अउर कथा में अइसन रेलमपेल मची है कि अदमी शांति से पूजव-पाठ नही कइ पाई रहा है। इही बीच भोरवय में राधेश्याम दूध लेवय तबेला जात रहें। जब तक गली से निकरते तब तक एक भावी नगरसेवक मिलि गए। का भैया, इतनी सुबहिये-सुबहिये कहाँ चले? कहीं नहीं नेता जी, बस घर खातिर दूध लेवय तबेला जाइ रहें हैं। अरे, तुम काहें तकलीफ कइ रहे हो, डिब्बा हमका देव हम तबेला से दूध लेइ आइत है। अब मारे संकोच के राधेश्याम उ भावी नगरसेवक के आपन दूध के डिब्बा अउर पइसा दइ दिहिन। एक घंटा बाद राधेश्याम नेताजी के फोन किहिन तो उ नेताजी एक गली में झाड़ू लइके खड़े रहें अउर उनके दुइ ठो चेला मोबाइल पे नेता जी के लाइव किये रहें। नेताजी जी कहि रहें हैं कि हम वार्ड के साफ-सफाई के लिए खुद झाड़ू लइके हर गली साफ करेंगे। हम अपने वार्ड के लिए अपने खून के एक-एक कतरा बहा देंगे। ई कहिके सामने वाले घर से झाड़ू माँगिन अउर कहें कि रुको बगल वाली गली से सफाई शुरू करीत है। तब से लइके आज तक न झाड़ू मिला, न राधेश्याम के दूध के पइसा वापस मिला अउर न तो उ दूध वाला डिब्बा।
