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बेबाक : अमेरिका तबाह हो रहा है!

अनिल तिवारी, मुंबई

ईरान और अमेरिका-इजरायल का युद्ध शांत होने के बजाय दिन प्रतिदिन घातक होता जा रहा है। दोनों ही पक्ष चाहे जो भी दावे करें, पर इसमें इजरायल समेत पूरे मिडल ईस्ट के आम नागरिकों का जीवन बदतर हो चुका है। खुद अमेरिका पर भी बेतहाशा आर्थिक बोझ बढ़ रहा हैं, जिसका खामियाजा उठाने को आम अमेरिकी तैयार नहीं है।
नई युद्ध रणनीति
दुनियाभर के सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान ने २१वीं सदी की युद्ध रणनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अभी तक जहां विकसित देशों का जोर उन्नत फाइटर जेट्स और इंटरसेप्टर मिसाइलों पर होता था, वहीं ईरान ने सस्ते ड्रोन्स और बैलिस्टिक मिसाइलों से दुश्मन की कमर तोड़ दी है। उसकी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों ने अपना लक्ष्य साध रखा है और वे कभी भी घातक तबाही मचाने को तैयार हैं। ईरान बखूबी जानता था कि कभी न कभी अमेरिका उस पर किसी न किसी कारण से हमला जरूर करेगा। वो अमेरिका, जो हरदम युद्ध लड़ने को तैयार रहता है, कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाइयां लड़ता रहता है और लड़ भी रहा है, उसे आज एक ऐसे देश का युद्ध में सामना करना पड़ रहा है, जिसने पिछले ३ दशकों से केवल उसी को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी कर रखी थी।
इसी का नतीजा है कि कतर स्थित अमेरिकी सैन्य बेस नष्ट हो चुका है। मिडल ईस्ट के सबसे अहम १.१ बिलियन डॉलर के अर्ली वार्निंग रडार को तबाह कर दिया गया है। जॉर्डन स्थित अमेरिकी थाड रडार सिस्टम नेस्तनाबूद हो चुका है। अमेरिका की काउंटर स्ट्राइक क्षमता कमजोर हो गई है। इतना ही नहीं ईरान ने अमेरिका के गल्फ नेवल ऑपरेशन सिस्टम के हेड क्वार्टर को पूरी तरह तबाह कर दिया है। इन सब के अलावा ईरान ने मिडल ईस्ट के अधिकांश सैन्य हवाई अड्डों सहित कमर्शियल एयरपोर्ट्स पर भी भारी तबाही मचाई है। जिससे अमेरिका की सैन्य रणनीति बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी है। नतीजा यह कि अब अमेरिका महंगे और सीमित सैन्य संसाधनों पर ही निर्भर है। उसे अतिरिक्त सैन्य बजट की आवश्यकता है, वह भी केवल अपने बचाव के लिए। जाहिर है जिसकी कीमत आम अमेरिकी नागरिक भुगतने को मजबूर होंगे। लिहाजा, ट्रंप सरकार पर उनका गुस्सा फूटना लाजिमी है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झटका
बहुसंख्य अमेरिकी मानते हैं `हम किसी भी कीमत पर यह युद्ध जीतने नहीं जा रहे। हमने बिना योजना बनाए ईरान पर हमला कर दिया, जबकि ईरान इस युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार था। वह पूरे मध्य पूर्व में अमेरिका की सैन्य छावनियों को नष्ट कर ही चुका है। उसके द्वारा किए गए नुकसान का हम अंदाजा भी नहीं लग पा रहे। बहरीन, कुवैत, कतर और सऊदी अरब के अमेरिकी बेस तबाह हो रहे हैं, जो अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य ठिकानों में से एक हैं, जिन्हें खड़ा करने में अमेरिका को ३-४ दशकों का समय, निवेश और योजना लगी है, उसे ईरान मिनटों में मात्र एक- एक मिसाइल से तबाह कर रहा है। हजारों करोड़ के रडार धुआं-धुआं हो रहे हैं। जिन रडारों पर पूरे मिडल ईस्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी वे खुद को ही नहीं बचा पा रहे हैं तो दूसरों की बात ही क्या करें। ईरान युद्ध में सीधे अमेरिका की आंखें ही फोड़ रहा है और अमेरिका लाचार है।’
ईरान के सस्ते और छद्म हथियारों को नष्ट करने के लिए अमेरिका हजारों करोड़ डॉलर की मिसाइलें बर्बाद कर रहा है। ईरान ने तो अभी तक अपने जखीरे से महंगे और उन्नत हथियार निकाले ही नहीं हैं। जब तक उन घातक हथियारों का नंबर आएगा तब तक तो शायद अमेरिका आर्थिक तौर पर पूरी तरह से बर्बाद हो चुका होगा। ईरान जितनी मिसाइलें एक दिन में दागे दे रहा है, उतनी मिसाइलें तो अमेरिका वर्ष भर में भी नहीं बना पाता है। फिर कैसे जीतता जाएगा यह युद्ध? और किस कीमत पर जीतता जाएगा? अमेरिकियों को नहीं लगता कि आज तक किसी युद्ध में अमेरिका को इतना सैन्य नुकसान हुआ होगा, जितना इस युद्ध की शुरुआत में ही वह झेल चुका है। `यह हमारी अक्षम राजनैतिक लीडरशिप की देन है। आज अमेरिका हर घंटे ४२ मिलियन डॉलर्स का नुकसान उठा रहा है। मतलब हर सेकंड ११,००० डॉलर। अमेरिका ईरान को सबक सिखाने के फर्जी दावे भले ही कर रहा हो, पर हकीकत में वो नई रणनीति बनाने को मजबूर हो चुका है। किसी तरह युद्ध से अपने पैर पीछे खींचने की जुगाड़ तलाश रहा है, ईश्वर को मना रहा है। व्हाइट हाउस में आपातकालीन बैठकें चल रही हैं। डिपार्टमेंट ऑफ वॉर से और अधिक धनराशि मांगी जा रही है। जबकि उसे पहले से ही १२० बिलियन डॉलर अतिरिक्त मिल चुके हैं। फिर भी वह ५० बिलियन डॉलर और मांग रहा है। जिस देश का सैन्य बजट एक ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष है, उसकी आज यह हालत है। कहां जा रहा है यह पैसा? क्या यही दिन देखने के लिए हमने ट्रंप को मतदान किया था? क्या हमने अमेरिका के लिए यही सपना देखा था? आज अधिकांश अमेरिकियों का यही सवाल है।
अपरिपक्व राजनीतिक का खामियाजा
अमेरिकी मानते हैं कि अमेरिका और इजरायल के पास एक से एक घातक मिसाइलें और हथियार हैं, जो पूरी की पूरी इमारतें उड़ा सकते हैं पर हकीकत यह है कि ईरान का सारा का सारा मिलिट्री इंप्रâास्ट्रक्चर जमीन के सैकड़ों फिट भीतर स्थित है। जहां तक अमेरिका और इजरायल की मिसाइलें पहुंच ही नहीं पा रहीं। खुद ईरान के रक्षा सूत्र लगातार दावा कर रहे हैं कि उनके सैन्य उपकरण ३०० फीट से भी अधिक गहराई में सुरक्षित हैं और वे जब भी चाहे तब मिनटोेंं में कहीं भी हमला करने में सक्षम हैं। वे ऐसा कर भी रहे हैं, उसकी ठोस ईंधन वाली मिसाइलें इसराइल समेत संपूर्ण मिडल ईस्ट के अमेरिकी सैनिक ठिकानों पर तबाही मचा रही हैं। अमेरिका के सैनिक हताहत हो रहे हैं, घायल हो रहे हैं उनका मनोबल टूट रहा है, उनके वरिष्ठ सैन्य अधिकारी व्हाइट हाउस में खुल्लम-खुल्ला ट्रंप के सनकी फैसले का विरोध कर रहे हैं।
कुल मिलाकर हालात यह हैं कि अमेरिका के अपरिपक्व राजनीतिक नेतृत्व ने पूरी दुनिया को अपना बैरी बना लिया है। पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है। बेवजह की अनैतिक `टैरिफ जंग’ लड़कर सभी को बदला लेने का मौका दे दिया है। आज रूस और चीन जैसे सुपर पावर देश ईरान को अमेरिका और इजरायल की सारी खुफिया सैन्य जानकारियां मुहैया करा रहे हैं। अमेरिका और इजरायल के हर कदम की अग्रिम जानकारी दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक अमेरिका इस युद्ध में टिक पाएगा और उसे हासिल होगा भी तो आखिर क्या? नतीजा जो भी हो, इतना तो तय है कि अमेरिकियों के दिमाग में एक बात धर कर गई है `एक गैर जरूरी, अनियोजित युद्ध का अंत अमेरिकियों की तबाही के साथ ही होगा क्योंकि हम जीत नहीं रहे हैं, हम एक समृद्ध देश को दिवालिया बना रहे हैं।’

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