मुख्यपृष्ठनए समाचाररोखठोक :  एक दिन ‘सूर्य'भी जल जाएगा! ... एसिड की बारिश!

रोखठोक :  एक दिन ‘सूर्य’भी जल जाएगा! … एसिड की बारिश!

संजय राऊत

ईरान-इजरायल, अमेरिका युद्ध में अब तक हजारों बम गिर चुके हैं। इनसे धुएं और आग के गुबार उठे। तेल के कुएं जला दिए गए। इससे तेहरान का आसमान काला हो गया और एसिड की बारिश होने लगी। डर है कि ये जहरीले काले बादल भारत के आसमान तक पहुंच जाएंगे। इससे बम गिरे बिना भी हमारा भारी नुकसान होगा!

ईरान, इजरायल-अमेरिका युद्ध में अब तक हजारों बम गिर चुके हैं। इमारतें, तेल रिफाइनरी और तेल के कुओं में आग लग चुकी है। इस आग की लपटों से अधिकांश देश अभी दूर हैं। ईरान ने दुबई, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी देशों पर भी बमबारी कर इन देशों का आसमान काले जहरीले बादलों से भर दिया है। जहां तक इस युद्ध की आंच नहीं पहुंची है, वहां तक इस बमबारी के दुष्परिणाम, खतरे पहुंचेंगे और इससे हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण आनेवाली पीढ़ियों को भी तकलीफें उठानी प़ड़ेंगी, यह तय है।
दुनियाभर के पर्यावरणविदों और जलवायु वैज्ञानिकों ने इस वैश्विक खतरे पर अपना चिंतन शुरू कर दिया है। इससे निकले निष्कर्ष भयावह हैं। सात-आठ मार्च की रात को, इजरायल ने तेहरान और अल्बोर्ज प्रांतों में चार प्रमुख तेल भंडार, बड़े तेल कुओं और तेल वितरण केंद्रों पर बमबारी की। इससे आग लग गई। शहर से गुजरने वाली तेल की पाइपलाइनों से तेल रिसने लगा। सड़कें काले कच्चे तेल से भर गईं और जगह-जगह आग लगने जैसी भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई। आसमान इतना काला हो गया कि तेहरान के लोग उस दिन सूरज को देख ही नहीं पाए। हवा में भारी मात्रा में जहरीले हाइड्रोकार्बन, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड घुल गए। शहर के प्रदूषित आसमान से बारिश होने लगी। उसने इन रसायनों को सोख लिया और तेलयुक्त, काले बारिश की धाराओं के साथ वह बरसने लगे। मानो आकाश से एसिड की बारिश हो रही हो। यह तस्वीर भयावह थी।
भारत के लिए असली खतरा
डॉ. अंजल प्रकाश भारतीय स्कूल ऑफ बिजनेस में क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वे बतौर संशोधन संचालक काम देखते हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘तेहरान के ऊपर मंडरा रहे काले विषैले बादलों से भारत अछूता नहीं है। सावधान रहें।’’ दुनिया के कुछ हिस्सों में जल्द ही एसिड की बारिश होगी। हम ईरान के संकट से बच नहीं पाएंगे, ऐसा इस विशेषज्ञ का मानना ​​है। भारत के लिए इन तेलयुक्त काले विषैले बादलों का खतरा वास्तव में क्या है? इस प्रश्न पर प्रोफेसर अंजल प्रकाश कहते हैं, ‘‘इस समय हवा की दिशा ईरान से पाकिस्तान के पश्चिमी क्षेत्र (बलूचिस्तान) की ओर बह रही है। पाकिस्तान का पश्चिमी क्षेत्र सबसे अधिक जोखिम में है। इससे इस क्षेत्र में फसलों की सिंचाई २० प्रतिशत तक प्रभावित होगी। पाकिस्तान से भारत के उत्तर-पश्चिम की ओर हवाएं बहती हैं। ऐसे में भारत भी इन जहरीले काले बादलों से प्रभावित होगा। इससे हिमालय और अन्य क्षेत्रों का पर्यावरण बिगड़ जाएगा। यदि ऊपरी पट्टी की तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम) चलती रहीं, तो ये काले बादल गुजरात, राजस्थान और पंजाब तक पहुंच सकते हैं। अफगानिस्तान को भी वही खतरा है। चूंकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान को खतरा ज्यादा है इसलिए भारत के चुपचाप बैठे रहने से कुछ होनेवाला नहीं है। यह जहर हवा और पानी के जरिए हर किसी को खतरे में डालने वाला है। तेल के लगातार जलने से निकलने वाले कण पांच से दस दिनों में दो हजार से तीन हजार किलोमीटर दूर तक पैâल सकते हैं। इस एसिड बारिश का असर लंबे समय तक रहेगा। इसके दुष्परिणाम कई वर्षों तक भुगतने पड़ेंगे। एसिड वर्षा से पेड़-पौधे, लताएं और वनस्पतियां कमजोर हो जाएंगी। पानी की गुणवत्ता खराब हो जाएगी। यह मानव स्वास्थ्य के लिए जहर है। गले और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
मानवजाति पर संकट
तेहरान में एसिड वर्षा और काले बादलों से भारतीय जनता को क्या खतरा है?
– पहले से मौजूद वायु प्रदूषण बमबारी और तेल जलने से और भी बढ़ गया है।
– कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को न्योता देनेवाली यह स्थिति है।
– इससे बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा खतरा है।
– कृषि भूमि की उर्वरता और गुणवत्ता प्रभावित होगी।
– अदालतों ने प्रदूषण रोकने के लिए पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसका कारण यह बताया गया कि इनसे धुआं निकलता है, लेकिन अब चुनौती तेहरान से आने वाली काली हवा, काले बादलों को रोकने की है। ये काले आतंकियों की तरह हवा और पानी के रास्ते आएंगे और मानवजाति पर अदृश्य हमला करेंगे।
दिल्ली सीमा पर कचरा जलाने से धुएं के बादल उठते हैं और प्रदूषण बढ़ता है। मुंबई जैसे शहर प्रदूषित हवा से जूझ रहे हैं। कारों से निकलने वाला काला धुआं लोगों के फेफड़ों को कमजोर कर रहा है, लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एसिड की वर्षा होगी। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। जापान की कई पीढ़ियां इसके परिणाम भुगत रही हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध में भी बमबारी जारी है और यूक्रेन में भी इसी तरह प्रदूषण हुआ। कोयला और तेल जलने से काले जहरीले बादल वहां भी निर्माण हुए। रूस और यूक्रेन की जनता इसके दुष्परिणाम भुगत रही है। यूरोप में भी जहरीले बादल मंडरात्ो नजर आ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण तापमान २.३ से २.५ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। अब ईरान युद्ध के साथ-साथ पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी एक-दूसरे पर बम गिरा रहे हैं और ये दोनों देश भारत की दहलीज पर हैं। पर्यावरण पूरी तरह से नष्ट हो जाए, ऐसी यह स्थिति है। जल और वायु परिवर्तन की राह को और भी आसान बनाने वाली एवं मानव जाति और अन्य प्राणी प्रजातियों की पीढ़ियों, वंश को मिटा देनेवाली यह युद्धस्थिति निर्माण हो गई है। भारत जैसे देश में पर्यावरण के प्रति पहले से ही चिराग तले अंधेरा वाली स्थिति है। उद्योगपतियों के लाभ के लिए जंगलों और पहाड़ों को काटा जा रहा है। समुद्र और नदियों को पाटकर उन पर इमारतें खड़ी की जा रही हैं। इसके बदले में लाखों-करोड़ों पेड़ लगाने के झांसे शासक देते हैं, लेकिन इतने पेड़ लगाने के लिए जमीन कहां है? पानी कहां है? ​खनन उद्योग ने तो पर्यावरण का रोज ही खात्मा शुरू कर रखा है। राज्यों और देश के पर्यावरण मंत्रालय केवल अवैध कृत्यों को मंजूरी देने वाले और उनसे पैसा वसूलने वाले व्यापारिक केंद्र बन गए हैं। पर्यावरण से संबंधित अपराध और मुकदमे अब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चलाने चाहिए। ​युद्ध एक अपराध ही है, लेकिन युद्ध की वजह से होने वाली ‘एसिड वर्षा’ जैसी घटनाएं पर्यावरणीय अपराध के ही समान हैं।
एक दिन तापमान इतना बढ़ जाएगा कि सूर्य भी जल उठेगा। काले बादल उस तेजस्वी सूर्य को भी धुंधला कर देंगे।
एसिड की बारिश हाहाकार मचाएगी।
युद्धखोर देशों से इसका जवाब कौन मांगेगा?

अन्य समाचार