संजय राऊत -कार्यकारी संपादक
प्रगतिशील कहलाने वाले महाराष्ट्र में पाखंड और बाबागीरी बहुत बढ़ गई है। अध्यात्मवादी बुवा, महाराजों की टोलियां बनाकर उन्हें भाजपा के प्रचार में खुलेआम लगा दिया जाता है। इससे सच्चा हिंदुत्व नष्ट हो गया है। वैâ. खरात की जगह कोई सलीम, अब्दुल, सुलेमान होता तो भाजपा महाराष्ट्र में आग लगाने में आगे-पीछे भी नहीं देखती।
महाराष्ट्र में अभी जो घटनाएं घट रही हैं, उसे देखते हुए यह संतों, समाजसुधारकों की भूमि है, ऐसा कहने में अब जुबान लड़खड़ाएगी। गुढीपाडवा के मौके पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का शिवतीर्थ पर सम्मेलन हुआ। इस महाराष्ट्र को किसने बनाया और महाराष्ट्र महान क्यों है? यह स्पष्ट करनेवाले, विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले महान लोगों के बारे में श्री. राज ठाकरे ने बताया। नई पीढ़ी को उनमें से कई विभूतियों के नाम मालूम नहीं होंगे; लेकिन वैâप्टन अशोक खरात का नाम अब घर-घर पहुंच गया है। क्योंकि खरात बाबा जैसे लोगों की एक लंबी सूची है, जिन्हें ‘महात्मा’ के रूप में एक दिन पेश करना पड़ेगा। नासिक जिले के वैâ. खरात बाबा के चरणों में महाराष्ट्र की राजनीति के और मंत्रिमंडल के कई रसूखदार लोग बैठते थे। खरात से भविष्य पूछते थे। पूजा-अर्चना, विधि करवाकर खुद के लिए संरक्षण कवच बनवाते थे। वही खरात यह सब करते हुए अनगिनत महिलाओं का शोषण करता था। बलात्कार करता था। उसने करोड़ों की संपत्ति इस पाखंड से जमा की। राज्य प्रशासन के कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी उसके भक्त और बिजनेस पार्टनर थे। जो पकड़े जाते हैं, वे भोंदू, लेकिन जो अनगिनत खरात अब तक पकड़े नहीं गए, उनका क्या? ऐसा प्रश्न अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने पूछा, वह सच है।
प्रबोधनकार के फटकारे
बुवाबाजी और पाखंड वैâसे फलता-फूलता है, इसका वर्णन एक स्थान पर प्रबोधनकार ठाकरे ने कठोर शब्दों में किया है। वे कहते हैं, ‘इन बाबाओं के अलौकिक और विचित्र चमत्कारों की बातें स्व-अनुभव के साक्ष्यों के साथ चारों ओर फैलाई जाती हैं। बड़े-बड़े पैसेवाले, पुत्रहीन, पदवीधर, पढ़े-लिखे, सांसारिक मोह-माया में रचे-बसे और अपनी अकर्मण्यता के कारण भाग्यवादी के हाथों बिके हुए ‘उल्लू’, उस बुवा के साधुत्व और अवतारी होने का ढिंढोरा पीटते हैं। उसके विचित्र उल्टे-सीधे कुकर्मों और बुरे कामों पर भी गूढ़ आध्यात्म की सुनहरी शॉल ओढ़ा दी जाती है। जीते-जी मेलों का मजमा जमता है और मरने के बाद समाधियों के देवस्थान बन जाते हैं। फिर उन बाबाओं और महाराजाओं का एक विशिष्ट संप्रदाय शुरू हो जाता है।
शिष्यों का समुदाय तो आसपास तैयार ही रहता है। फिर बाबा के बाद उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर कौन बैठेगा? इस मसले को लेकर झगड़े शुरू होते हैं। साजिशें रची जाती हैं, मारपीट होती है। मठ में जमा धन-संपत्ति, मठ, समाधि, खेत-खलिहान और इमारतों के हक के विवाद अदालतों की सीढ़ियां घिसने लगते हैं। कुछ वकील शिष्य इस पक्ष में, तो कुछ उस पक्ष में ऐसा दिखावा तैयार होता है। यानी बुवा का सच्चा-झूठा अध्यात्म तो बुवा के साथ ही समाधि में चला जाता है और मठ-समाधि के संसार का मकड़जाल शिष्य-प्रशिष्यों के पीछे लग जाता है। इस सारे प्रपंच और मोक्ष-साधना के कोलाहल में देश की अवस्था क्या है? पिछड़े श्रमजीवी जनता के जीवन की स्थिति वैâसी है? कितने लोग मुश्किल से एक वक्त का खाना पाते हैं और कितने भुखमरी से मर रहे हैं? भिखारियों, अपंगों और विक्षिप्त लोगों की संख्या क्यों बढ़ रही है? उनके जीने-मरने की कोई सुध लेता है या नहीं? सालभर खेत में पसीना बहाने के बाद भी किसान भीख मांगने की नौबत पर क्यों है? सैकड़ों जातियों की दिनचर्या कई गंदी रूढ़ियों के कारण पाशविक अवस्था तक वैâसे पहुंच गई? व्यसनों की अति के कारण पूरे के पूरे परिवार कूड़े के ढेर पर वैâसे फेंके जा रहे हैं? साहूकारों और सत्ताधारियों का जुल्म गांव-गांव में वैâसा चल रहा है? इन जैसे प्रश्नों की उन मठ-पीठ पूजक आध्यात्मिक संपन्न लोगों को रत्तीभर भी चिंता या परवाह नहीं होती। ‘तू तो राम सुमर, जग लढवा दे’ (तू बस राम सुमिरन कर, जगत को लड़ने दे) यही उनका एकमात्र सिद्धांत होता है। बुवाबाजी के जाल में फंसे हर स्त्री-बुवा की चिंता केवल स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिए होती है। उसी के लिए कथा, कीर्तन, पुराण और भजनों का अखंड अट्टहास चलता रहता है। कथा-कीर्तनों ने किया क्या? कथा, कीर्तन, पुराण और भजन जैसी संस्थाएं काफी पुरानी हैं। लोगों में धर्म-जागृति करने का पुण्य अपने नाम करने का यह एक तथाकथित संभावित तरीका है। वह धर्म-जागृति कौन सी? कथा, कीर्तन, पुराण, भजन जो चाहे सुनिए। उनमें प्रवचन का मुख्य झुकाव गूढ़ आध्यात्म की निरर्थक चर्चा की ओर होता है, वह आध्यात्म खुद कथावाचक और पुराणवाचक को भी समझ नहीं आया होता। वे केवल पोथियों के भारी-भरकम शब्दों की तोता-रटंत करते हैं। आत्मा, परमात्मा, योगसिद्धि, समाधि, गुरुपदेश, सदेही-विदेही मोक्ष जैसे शब्दों की अंधाधुंध बुआई की कि समझो कथा-पुराण का रंग जम गया।’
यह प्रबोधनकार ठाकरे के विचार हैं। धर्म-जागृति के नाम पर आज जो बुवाबाजी का चरम और अध्यात्म सेना नामक जो सिलसिला भाजपा की छत्रछाया में शुरू हुआ है, उसमें असंख्य खरात बाबा जैसे लोग भी शामिल हैं। खरात बाबा के घर पर पूजा-विधि के लिए आने वाले लोगों की तस्वीरें देखें तो यह सहज ही समझ में आता है कि यह खरात बाबा किस पार्टी का प्रचारक था। बच्चू कडू को ‘बाबा’ आशीर्वाद दे रहा है कि भाजपा के मंत्रिमंडल में मंत्री बनकर मुझसे मिलो। इस खरात बाबा की सभी प्रमुख सत्ताधारी और राजनीतिक लोगों के साथ फोटो हैं। यह दृश्य देखकर महाराष्ट्र किस अधोगति की ओर जा रहा है, इसका घृणास्पद प्रदर्शन होता है।
भोंदूबाबाओं की पार्टी
मुख्यमंत्री फडणवीस और उनकी पार्टी ने चुनाव में प्रचार के लिए और वोट पाने के लिए ऐसे अनगिनत भोंदूबाबाओं का सहयोग लिया। हिंदुत्ववादी कहलाने वाले संगठनों के माध्यम से यह अनोखी धर्मजागृति होती रहती है। भोंदूगीरी मतलब ही हिंदुत्व ऐसा समझा दिया जाता है। विधानसभा, लोकसभा प्रचार में इन बाबा, महाराज, कीर्तनवालों को नकद पैसे देकर प्रचार में उतारा जाता है। हरियाणा-पंजाब में रामरहीम जैसे बाबा और महाराष्ट्र में खरात बाबा, किसी समय में आसाराम बापू भी भाजपा के हिंदुत्वरक्षक, प्रचारक थे। समाज में धर्मांधता बढ़ाना, लव जिहाद, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दे उठाना और हिंदुत्व खतरे में होने की ‘बांग’ मारना यही उनका धंधा है। ‘लव जिहाद’, हिंदू-मुसलमान प्रेम-विवाह प्रकरण में उस गांव में घुसकर दहशत फैलानेवाले गोपीचंद पडलकर, संग्राम जगताप जैसे ‘अध्यात्मवादी’ लोग खरात के मामले में दुम दबाकर बैठ गए। खरात ने अनगिनत हिंदू महिलाओं को फंसाया और शोषण किया। खरात का नाम सलीम, अब्दुल, सुलेमान होता तो ये गोपीचंद, जगताप जैसे लोग तोप लेकर नासिक में घुस गए होते और हिंदुत्व खतरे में होने की गर्जना करते हुए मोर्चा, आंदोलन की चिंगारी डालकर आग लगा दी होती। नासिक जिले के किसी बाबा ने महिलाओं का शोषण किया; लेकिन शिकायतकर्ता महिला पर पुलिस दबाव लाकर चुप कराने की अगुवाई भाजपा के मंत्रियों ने की और उसके बदले इस बाबा को विधानसभा में भाजपा का गुप्त प्रचार करने के लिए तैयार किया। इसे भी एक तरह से महिलाओं और अध्यात्म का शोषण ही कहना होगा। हिंदुत्व को लज्जा आ जाए, ऐसे यह कृत्य हैं। महाराष्ट्र के कई भ्रष्ट राजनेता जैसे भाजपा में जाकर शुद्ध हो गए, वैसे ही इन बुवा, बाबाओं के शुद्धीकरण के लिए अलग वॉशिंग मशीन भाजपा कार्यालय में लाई गई है, ऐसा लगता है। फडणवीस की सरकार इस अंधश्रद्धा की विधि से भैंसों-बकरों की बलि देकर लाई गई है। यही ‘बलिभाई’ सतत खरात बाबा के दरबार में पूजा-अर्चना करके फडणवीस का राज उलटने की अध्यात्म सेवा करते रहे।
भोंदूगीरी, बुवाबाजी, देववाद के भ्रम से लोगों के मन साफ मार दिए गए हैं। राष्ट्रभक्ति नष्ट हो गई है। राजनेता भविष्य देखने ज्योतिषी के पास जाते हैं और किसान, मेहनतकश अंधकारमय भविष्य की खाई में ढकेला जा रहा है।
खरात बाबा के प्रत्येक राजनीतिक भक्त पर कार्रवाई हुई तो ही ठीक होगा।
