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विक्रम-बेताल : श्रमिक दिवस विशेष … जिसकी गरिमा बिकी आज का मजदूर है वही!

 

मनमोहन सिंह

रात का सन्नाटा है। श्मशान की ओर बढ़ते विक्रम के कंधों पर बेताल लटक रहा है। बेताल अचानक खिल-खिलाकर हंसता है और कहता है, `राजन! तलवार छोड़ो, जरा हाथ में पकड़े इस स्मार्टफोन की चमक देखो। तुम तो पुराने जमाने के जिद्दी हो, पर आज के पढ़े-लिखे मजदूरों की कहानी सुनो।’
बेताल की कहानी: सूट-बूट वाला मजदूर
`सुनो राजन! एक था आधुनिक नगर, जहां हजारों युवा दिन की रोशनी नहीं देखते। वे कांच की बड़ी इमारतों में, एयर कंडीशनर की ठंडी जेल में बैठते हैं। उनके हाथ में भाला नहीं, लैपटॉप है। वे फटे हुए कपड़ों में नहीं, ब्रांडेड कमीजों में हैं, जिन्हें वे इंवेस्टमेंट कहते हैं। ये नए जमाने के मजदूर हैं, जिन्हें कंपनी प्यार से असोसिएट या लीड कहती है, ताकि उन्हें ये एहसास न हो कि वे बस एक बड़े एक्सेल शीट के मामूली नंबर हैं। नोएडा और मानेसर के मजदूर तो सड़क पर उतरकर चिल्ला भी लेते हैं, लेकिन ये लैपटॉप वाले मजदूर तो रोते भी साइलेंट मोड पर हैं। इनकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ये खुद को मैनेजमेंट का हिस्सा समझते हैं, जबकि मैनेजमेंट उन्हें सिर्फ रिसोर्स समझता है।’
बेताल ने गहरी सांस ली और बोला, `राजन, इन मजदूरों के गले में चैन नहीं, बल्कि ईएमआई यानी इजी मंथली इन्स्टॉलमेंट का फंदा है। ये मजदूर आजाद होने का सपना देखते हैं, पर महीने की १ तारीख को इनके बैंक अकाउंट से आत्मा निकल जाती है और सिर्फ मेटाबॉलिज्म बचता है। इनका वर्क-लाइफ बैलेंस वैसा ही है, जैसे हिमालय पर गर्मी की तलाश सिर्फ किताबों में मिलता है। ये वीकेंड का इंतजार ऐसे करते हैं जैसे प्यासे रेगिस्तान में पानी का, पर शनिवार की शाम को अर्जेंट ईमेल की जहरीली नागिन इन्हें डस लेती है।’ `राजन, शिकागो के मजदूरों ने तो गोली खाई थी, पर आज का ये मजदूर बर्नआउट खाता है। नोएडा-मानेसर के संघर्ष को साजिश बताया जा रहा है, और इन बेचारे कॉर्पोरेट मजदूरों के संघर्ष को परफॉर्मेंस इश्यू।’
`१ मई को पूरी दुनिया में मजदूर दिवस मनाया जाता है। इसी दिन, मजदूर दिवस पर इन्हें बधाई का पिज्जा-बर्गर खिलाया जाता है, ताकि ये अपनी भूख और हक दोनों भूल जाएं। इनका प्रतिरोध सड़क पर नहीं, बल्कि लिंक्डइन के पोस्ट में दफन हो जाता है। ये गुलाम तो हैं, पर इनके पास सिल्वर स्पून नहीं, सिल्वर बेड़ियां हैं।’
बेताल का यक्ष प्रश्न
कहानी खत्म कर बेताल ने विक्रम की गर्दन सहलाई और पूछा, `हे राजन! अब बताओ, असली मजदूर कौन है? वह जो सड़कों पर लाठियां खाकर अपने न्यूनतम वेतन के लिए लड़ रहा है और देशद्रोही का टैग झेल रहा है? या वह जो सूट-बूट पहनकर ईएमआई के डर से अपनी रीढ़ की हड्डी घर पर भूल आता है और मंडे ब्लूज को अपनी नियति मान चुका है? मजदूर दिवस पर केवल एक हैप्पी लेबर डे का स्टेटस लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेता है? अगर जानते हुए भी तुमने जवाब नहीं दिया, तो तुम्हारे इस महंगे शोरूम वाले सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे!’
विक्रम का जवाब
`बेताल! आज के समय में मजदूर वह नहीं जो सिर्फ पसीना बहाए, बल्कि वह है जिसकी गरिमा का सौदा हो चुका है। सड़क वाला मजदूर दमन का शिकार है और लैपटॉप वाला भ्रम का। पर असली गुलाम वह है, जिसकी सांसें ईएमआई के फंदे ने रोक रखी हैं। वह लड़ना तो चाहता है, पर उसका क्रेडिट स्कोर उसे सड़क पर आने की इजाजत नहीं देता। मजदूर दिवस बधाई का नहीं, अपनी बेड़ियां पहचानने का दिन है चाहे वे लोहे की हों या डिजिटल।’
जवाब सुनते ही बेताल हंसा और फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका, क्योंकि विक्रम ने मौन तोड़ा था और आज की दुनिया में मौन तोड़ना ही सबसे बड़ा जोखिम है।

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