तौसीफ कुरैशी
दुनिया को अगर एक दूसरे से मिलाने का या व्यापार को बढ़ावा देने और उसे एक सूत्र में पिरोना हो तो वह है तेल। और तेल की राजनीति का दूसरा नाम डॉलर बना दिया गया था और यह संभव हो पाया था अमेरिका की दादागीरी के चलते। दशकों तक यह तय रहा कि तेल बिकेगा तो डॉलर में ही बिकेगा और दुनिया की अर्थव्यवस्था उसी धुरी पर घूमेगी। यही वह ‘पेट्रोडॉलर’ व्यवस्था थी, जिसने अमेरिका को सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था का केंद्र बना दिया है या अब ये भी कहा जाने लगेगा कि था, क्योंकि अब इस व्यवस्था में दरारें साफ दिखने लगी हैं। ओपीईसी कभी तेल उत्पादक देशों की सामूहिक ताकत का प्रतीक था।
नई आर्थिक संभावनाएं
सऊदी अरब इसके केंद्र में था और अमेरिका के साथ उसकी समझदारी ने पेट्रोडॉलर को स्थिर रखा। मगर आज वही ढांचा अंदर से हिलता नजर आ रहा है। खाड़ी के देश अब एक सुर में नहीं बोल रहे, बल्कि अलग-अलग रणनीतियों के साथ खेल रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का हालिया रुख इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है। वह बाहर से पश्चिमी खेमे के साथ खड़ा दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर नई आर्थिक संभावनाओं की तरफ बढ़ रहा है। अगर वह तेल का व्यापार डॉलर के बजाय करंसी युआन में करता है तो यह सिर्फ मुद्रा का बदलाव नहीं होगा यह शक्ति संतुलन का परिवर्तन होगा। यह समझना जरूरी है कि पेट्रोडॉलर सिर्फ आर्थिक व्यवस्था नहीं था, यह एक राजनीतिक हथियार भी था या है। जो देश डॉलर में व्यापार करता था, वह अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में रहता था। जो इससे बाहर जाने की कोशिश करता, वह दबाव में आता कभी प्रतिबंधों से, कभी युद्ध से। अब वही हथियार कुंद पड़ता दिख रहा है या पड़ गया है।
नया सिल्क रूट!
सऊदी अरब और यूएई के बीच जो सतही मतभेद दिखते हैं, वह दरअसल इस बड़े खेल का हिस्सा हैं। एक तरफ सऊदी संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ यूएई नए विकल्प तलाश रहा है। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा भी है और एक तरह की समझ भी कि दुनिया बदल रही है और उसमें अपनी जगह वैâसे सुरक्षित रखी जाए। इस पूरे खेल में चीन की भूमिका निर्णायक बनती जा रही है। उसने चुपचाप एक वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर ली है, जहां ऊर्जा के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो और स्थलीय मार्गों से आपूर्ति सुनिश्चित हो। यही वह ‘नया सिल्क रूट’ है, जो मध्य एशिया से होकर गुजरता है और तेल को सीधे एशिया तक पहुंचाता है। इसका मतलब साफ है हॉर्मुज जैसी सामरिक जगहों का महत्व धीरे-धीरे कम किया जा रहा है। जहां कभी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा टिकी थी, वहां अब विकल्प खड़े किए जा रहे हैं तो इसका असर क्या होगा? पहला असर यूरोप पर पड़ेगा। उसकी इंडस्ट्री पहले ही ऊर्जा संकट से जूझ रही है। अगर तेल की आपूर्ति नए नियमों पर होने लगी और भुगतान डॉलर के बजाय दूसरी मुद्राओं में हुआ तो यूरोप को अपनी आर्थिक रणनीति बदलनी पड़ेगी, बल्कि अगर ये कहा जाए कि यूरोप और नाटो की हालत बहुत खराब हो चुकी है क्योंकि रुस ने यूक्रेन युद्ध में उसकी सारी हवा निकाल दी है। दूसरा असर खुद अमेरिका पर होगा। पेट्रोडॉलर उसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है उसी की बुनियाद पर वह राज करता आया है। अगर यह कमजोर होता है तो उसकी वैश्विक पकड़ भी ढीली पड़ेगी। डॉलर की मांग घटेगी और उसके साथ ही अमेरिका की आर्थिक शक्ति का एक बड़ा स्तंभ भी हिलेगा। तीसरा असर खाड़ी देशों पर होगा। उन्हें अब संतुलन बनाकर चलना होगा एक तरफ पुराना गठजोड़, दूसरी तरफ नई संभावनाएं। यह आसान नहीं होगा, क्योंकि हर कदम पर जोखिम है। और चौथा, सबसे बड़ा असर वैश्विक व्यवस्था पर होगा। दुनिया एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय की ओर बढ़ रही है। जहां पहले एक ही केंद्र था, अब कई केंद्र बन रहे हैं, लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। यह बदलाव उतना सीधा और तेज नहीं होगा, जितना कई लोग मान रहे हैं। पेट्रोडॉलर रातोंरात खत्म नहीं होगा। यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें उतार-चढ़ाव होंगे, समझौते होंगे, टकराव भी होंगे यानी, यह अंत नहीं, संक्रमण है।
मिडिल ईस्ट अब सिर्फ संघर्ष का मैदान नहीं, बल्कि नई आर्थिक व्यवस्था की प्रयोगशाला बन चुका है। यहां जो हो रहा है, उसका असर सिर्फ इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा यह पूरी दुनिया की दिशा तय करेगा और यही इस समय की सबसे बड़ी सच्चाई है तेल अभी भी दुनिया चला रहा है, लेकिन अब वह एक ही दिशा में नहीं बह रहा।
सत्यमेव जयते
