मुख्यपृष्ठस्तंभसत्ता पक्ष में माहौल न बनाए सर्वे कंपनियां…

सत्ता पक्ष में माहौल न बनाए सर्वे कंपनियां…

बीते दशकभर में अब एग्जिट पोल्स पर से लोगों का भरोसा उठता हुआ दिखने लगा है। कारण यह है कि एग्जिट पोल्स सटीक तरीके से चुनाव नतीजों के साथ मेल नहीं खा रहे। पिछले कुछ चुनावों में कुछ एग्जिट पोल तो बिल्कुल ही गलत साबित हुए हैं। जैसा कि अभी हाल ही में पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं तो सबकी निगाह यहां बनी हुई है। हाल ही में तमिलनाडु, असम, केरल,पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल हुए चुनावों के एग्जिट पोल जो दिखाए जा रहे हैं,लेकिन इस बार लोग उस पर विश्वास नही कर रहे। इस कारण भी सबके सामने हैं लेकिन अब सवाल यही उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? पहले केवल विधानसभा या लोकसभा एक हजार लोगों से राय लेते थे और उससे ही उस सीट की जीत व हार तय करते थे। लेकिन अब पांच व दस हजार लोगों से राय लेकर भी एग्जिट पोल्स सटीक नहीं बैठ रहे। और ज्ञात हो कि चुनाव संपन्न होने के बाद ही सर्वे कंपनियां अपना रिजल्ट बता दी थी लेकिन अब पहले चरण में हुए चुनाव से ही अपने रिजल्ट रख देते हैं व इसके अलावा अब आरोप यह लगने लगे कि सर्व कंपनियों को किसी भी पार्टी के पक्ष में हवा बनाए रखने के लिए गलत रिपोर्ट देने लगी जिससे की पार्टी को फायदा हो। दूसरा पहलू यह है कि एग्जिट पोल के सर्वे इस बात पर आधारित होते हैं कि वोटिंग करके मतदान केंद्रों से निकल रहे लोग सही जवाब देंगे लेकिन ऐसा होता नहीं है। कुछ मतदाता वास्तव में झिझकते हैं व कुछ गोलमोल जवाब देते हैं तो कुछ गलत भी बताते हैं। समझा यह भी जाता है कि मतदाता दबाव, डर, सामाजिक परिस्थितियों के चलते खुलकर अपने मत का खुलासा नहीं करते। एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां सभी मतदान केंद्रों को कवर नहीं कर पातीं। रैंडम सैंपलिंग की कमी और छोटी सैंपल साइज के कारण भी परिणाम गलत हो सकते हैं। अक्सर सर्वे एजेंसियां वोट शेयर का अनुमान तो सही लगा लेती हैं, लेकिन वह वोट किस सीट पर कितना प्रभावी होगा इसका सटीक अनुमान नहीं लगा पातीं। कई बार एग्जिट पोल का इस्तेमाल सत्ताधारी पार्टी माहौल बनाने के लिए किया जाता है। सर्वेक्षकों के पक्षपातपूर्ण रवैये और सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में झुकाव होने के कारण भी परिणाम वास्तविक नतीजों से अलग हो सकते हैं। मतदान के अंतिम चरणों या वोट डालने से ठीक पहले के रुझान सर्वे में कैद नहीं हो पाते जिससे अंतिम परिणाम सर्वे में बताए हुए परिणामों के व विपरीत दिखते हैं। यह बात लगातार दिखने लगी और इस वजह से सर्व की गंभीरता कम होने लगी। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले चार दशकों में 833 सर्वेक्षणों जिसमें 386 पूर्व मतदाता पोल यानी ओपिनियन पोल व 447 एग्जिट पोल शामिल है जिसमें लगभग तीन तिहाई सर्वेक्षणों ने सही विजेता पार्टी का अनुमान लगाया। एग्जिट पोल की सफलता दर भारत में लगभग अस्सी प्रतिशत बताई गई है जाती रही है जबकि पूर्व-मत सर्वेक्षण की सफलता दर सत्तर प्रतिशत से भी ज्यादा थी। कुछ आंकड़ों के अनुसार भारत में एग्जिट पोलों का सटीकता काफी सीमित मानी जाती थी लेकिन अब सबसे ज्यादा अविश्वास हमारे देश में उत्पन्न होने लगा है। एक कहावत भी है कि अति हर चीज की बुरी होती है इसलिए सर्व कंपनियों की कार्यशैली पर लगातार सवालिया निशान खड़े होने से जनता मन में एग्जिट पोल्स की गंभीरता खत्म होने लगी। सर्वे कंपनिया लाखों-करोडों रुपयों खर्च कर सर्व कराती है जिससे चुनाव से पहले एक रोमांच पैदा होने लगा था लेकिन अब ऐसा नहीं होता। यदि विश्वसनीय को बनाए रखना हो तो सर्व कंपनियों को अपना पैटर्न बदलना होगा जिससे कि उनका काम चलता रहे साथ ही उनके सर्वे पर विश्वसनीयता भी बनी रहे। अन्यथा फ्रांस, इटली, जर्मनी, कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका, चेक गणराज्य में भी निर्वाचन स्थल पर एग्जिट पोल भारत में प्रतिबंधित न हो जाए। चूंकि इन देशों का मानना है कि किसी भी चुनाव का पहले से रिजल्ट से देश या राज्य में एक नकारात्मकता फैलती है और जो भी निर्णय होगा वो नेता या पार्टी को स्वीकार करना चाहिए। वहीं इससे किसी भी नेता या पार्टी जीतने व हारने को लेकर सट्टेबाज करोडो का सट्टा लगाते हैं जिससे अव्यवस्था फैलती है।एक नजरिये से यह सही लगता है सर्वे नही होना चाहिए चूंकि निर्णय की जिज्ञासा का बना रहना जरूरी है। इसलिए सर्वे हो तो इसकी विश्वसनीयता बनी रही या फिर न हों।

योगेश कुमार सोनी
वरिष्ठ पत्रकार

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