मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाक : दीदी का गुस्सा जायज है!

बेबाक : दीदी का गुस्सा जायज है!

अनिल तिवारी, मुंबई

पश्चिम बंगाल जीत के बाद माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है, मानो भाजपा ने बंगाल नहीं, बांग्लादेश जीत लिया हो। जीत भी ऐसी कि उसके सामने ईरान की हार भी छोटी लगे! वरना भला मिस्टर प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप युद्ध की व्यस्तता को दरकिनार कर क्या मोदी जी को बधाई संदेश भेजते? भारत के किसी राज्य की आंतरिक हार-जीत को ऐतिहासिक बताते? आज ऐसा लग रहा है जैसे बंगाल जीतकर भाजपा ने अंग्रेजों को दूसरी बार देश निकाला दे दिया हो और पहली बार देश के किसी हिस्से में लोकतंत्र बहाल हुआ हो।
विपक्षी एकता की याद
भाजपाइयों का उत्साह समझ में आता है। ऑपरेशन सिंदूर पर जश्न मनाने का अवसर शायद पूरा नहीं मिल सका, तो बंगाल विजय पर ही सही। लेकिन इस जश्न में जब केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार को भी बुराई नजर आने लगे और उन्हें अपने ही कार्यकर्ताओं से कहना पड़े कि भाजपा को भाजपा ही बने रहना चाहिए, तो यह दिलचस्प नजर आता है। जीत के बाद जब विजेता को अपने ही लोगों को संयम का पाठ पढ़ाना पड़े, तो समझिए विजय केवल मतों की नहीं, मनोवृत्ति की परीक्षा भी बन चुकी है। खैर, दीदी कहती हैं, `प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने मिलकर उन्हें हराया है, १०० सीटें लूटी गर्इं और चुनाव आयोग इस पूरे प्रकरण का मुख्य ‘विलेन’ है। उन्होंने जीवन में ऐसा चुनाव नहीं देखा।’ ये आरोप गंभीर हैं और लोकतंत्र के लिए भयावह भी। भारतीय राजनीति की विडंबना ही यही है कि अब सिस्टम चुप्पी साधे रखता है और विपक्ष चुनाव हार जाता है! सवाल पूछे जाते हैं, मगर सिस्टम चुप्पी नहीं तोड़ता। ऐसे में बंगाल वाली दीदी का नाराज होना जायज भी है। लेकिन थोड़ा नाराज उन्हें खुद पर व अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं पर भी होना चाहिए। जो हमेशा निजी दुर्ग बचाने का खेल खेलते रहे हैं। जब अन्य राज्यों में विपक्षी दल टूट रहे थे, सरकारें बदल रही थीं, एजेंसियां सक्रिय थीं, तब कई नेताओं को लगता था यह सब उनके साथ नहीं होगा। ‘एकला चलो’ का नारा तब आत्मविश्वास लगता था, आज वही राजनीतिक एकांत बन रहा है। पार्टी टूटने के बाद केजरीवाल को और बंगाल हारने के बाद दीदी को विपक्षी एकता की याद आई है, जो अच्छी बात है लेकिन यही दूरदृष्टि पहले होती तो शायद आज तस्वीर दूसरी हो सकती थी।
झाल मुड़ी नहीं झोल-मुड़ी
अलबत्ता, बंगाल में तो झालमूड़ी के संकेत साफ थे कि चुनाव में ‘झोल-मुड़ी’ होने ही वाला है। उत्तर प्रदेश में योगी जी वैâटरिंग उद्योग से जुड़े कारीगरों, श्रमिकों और हलवाइयों को व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण आज देने जा रहे हैं, मोदी जी ने तो यह ट्रेनिंग कार्यकर्ताओं, सिस्टम और सियासत को बहुत पहले ही दे दी थी। खुद कांग्रेस के दिग्गज शशि थरूर मानते हैं कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की तरह चुनाव करवाने की क्षमता किसी में नहीं। तो दीदी, आप भी मान ही लीजिए कि यह चुनाव केवल चुनाव नहीं था; यह सियासी प्रबंधन, संगठन, संसाधन और माहौल गढ़ने की ऐसी संयुक्त कार्यशाला थी, जिसमें विपक्ष परीक्षा देने पहुंचा और सत्ता पक्ष प्रश्नपत्र भी, मूल्यांकन भी और परिणाम का नैरेटिव भी साथ ले आया। लिहाजा, चुनावी राजनीति की ‘झाल-मूड़ी’ हो गई। वैसे भी झलमुड़ बनाने के लिए लगता क्या है? मुरमुरे, प्याज, टमाटर, आलू, हरी मिर्च, धनिया पत्ती, सरसों का तेल, नींबू का रस, भुनी हुई मूंगफली, चने, नारियल और मसाले ही न! यह सब था तो बंगाल में। मुरमुरे की तरह पैâले हुए भाजपाई कार्यकर्ता, प्याज व टमाटर की तरह छितरी हुई उनकी आईटी सेल, आलू की तरह उबले हुए स्टार प्रचारक, हरी मिर्च की तरह ममता दीदी का स्वभाव, धनिया पत्ती की तरह हर तरफ बिखरा हुआ प्रशासन, सरसों के तेल की तरह चुनाव आयोग, नींबू के रस की तरह कांग्रेस व अन्य दल, भुनी हुई मूंगफली की तरह खीजी टीएमसी, चने के रूप में गोदी मीडिया और नारियल की तरह सख्त दिशा-निर्देश व मसालों की तरह ‘बिखरी’ हुई बंगाल की जनता। सब कुछ तो था। इन सभी की बदौलत तो इस चुनावी झालमुड़ी को अनोखा स्वाद मिला। हां, चुनाव आयोग ने भी इसका झाला टेस्ट बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सचमुच यह झालमुड़ी बनी तो बेहद अच्छी थी पर उसमें अप्रत्याशित रूप से निकले सिर के एक बाल ने पूरा मजा किरकिरा कर दिया और बाल भी निकाला तो किसका, अनुपम खेर का! अब आप पूछेंगे कि भाई जब अनुपम खेर के सिर पर बाल ही नहीं हैं तो भला वह झालमुड़ी में आया कहां से? यही तो आज के लोकतंत्र की कलाकारी है जो होता नहीं है, नतीजे में वही निकलता है। भला दीदी भी और क्या बोल रही हैं? यही न, कि बंगाल के नतीजे ऐसे हो ही नहीं सकते। फिर भी ईवीएम के पेट से वो निकले न। जब पूरा सिस्टम ही एक `पक्ष’ में हो तो भला चुनावों के निष्पक्ष होने की उम्मीद कौन पाल सकता है। आप भी मत पालो दीदी! वैसे भी यहां असल सवाल बालों का नहीं, आबरू का है।
आत्ममंथन की जरूरत
आज जो भाजपा नेता ममता बनर्जी पर लोकतंत्र की आबरू से खिलवाड़ का आरोप लगा रहे हैं, वही प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, केंद्रीयमंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की फौज लेकर बंगाल जीतने पहुंचे थे। यदि इस ऊर्जा का दशांश भी मणिपुर में लगाया गया होता, तो शायद वहां बेसहारा और लाचार महिलाओं की आबरू निर्ममता से तार-तार न होती।
खैर बंगाल का चुनाव केवल एक राज्य की सत्ता परिवर्तन कथा नहीं है। यह सत्ता की मशीनरी, विपक्ष की कमजोरी, लोकतंत्र की विश्वसनीयता, चुनावी नैरेटिव और राजनीतिक अहंकार सभी का आईना है। फर्क बस इतना है कि इस आईने में ही सैकड़ों दाग हैं। लिहाजा, किसी को आश्चर्य होना कि हारने के बाद भी कोई मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार कर रही हैं तो उनका यह आश्चर्य उचित भी है। लेकिन इस देश ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसा बहुत कुछ देखा है, जो पहले न तो सुना गया था, न ही देखा गया था और अब यही उसका चरम बिंदु हो, ऐसा भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। इसलिए `दीदी, गुस्सा थूक दीजिए। हार पर रोष रखिए, पर आत्ममंथन भी कीजिए।’ भाजपा भी जश्न मनाए, मगर विजय को प्रतिशोध का लाइसेंस न समझे। चुनाव आयोग पर सवाल उठें तो जवाब भी आएं। विपक्ष बिखरा रहे और फिर लोकतंत्र बचाने की दुहाई दे, यह भी जनता बहुत दिनों तक नहीं खरीदेगी क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है; वह नागरिकों की गरिमा बचाने की जिम्मेदारी भी है।

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