मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाक :  विजय विजयी!..‘राज’भवन को राजतंत्र ने दिखाया आईना

बेबाक :  विजय विजयी!..‘राज’भवन को राजतंत्र ने दिखाया आईना

अनिल तिवारी,  मुंबई

आखिर विजय विजयी हो ही गए। भाजपा की लाख कोशिशें भी उन्हें बहुमत हासिल करने से नहीं रोक पार्इं। यह बताता है कि तमिलनाडु की राजनीति में दलपति विजय की यह सरकार केवल एक सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि उस राजनीति की पराजय है जो बहुमत से अधिक बंद कमरों की जोड़-तोड़ पर भरोसा करती है। विजय की टीवीके सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत जीतकर यह साफ कर दिया कि तमिलनाडु की सत्ता का पैâसला राजभवन की प्रतीक्षा, दलों की सौदेबाजी या परदे के पीछे बने समीकरणों से नहीं, बल्कि सदन के पटल पर निर्वाचित विधायकों की संख्या से होगा।
रणनीतिक विफलता
तमिलनाडु में दलपति विजय की पार्टी टीवीके हालिया विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी थी, लेकिन वो पूर्ण बहुमत से कुछ सीटें पीछे रह गई थी। जिसके बाद कांग्रेस, वाम दलों, वीसीके, आईयूएमएल और अन्य समर्थक विधायकों के सहयोग से विजय ने पहले राजभवन के सामने बहुमत का दावा पेश किया और फिर विधानसभा में १४४ मतों के साथ विश्वास मत भी हासिल कर लिया। पहली नजर में कहानी इतनी ही नजर आती है पर यह तो शुरुआत भर है, जिसका सबसे बड़ा झटका भाजपा-एआईएडीएमके खेमे को लगा है। एआईएडीएमके ने चुनाव में ४७ सीटें जीती थीं, लेकिन फ्लोर टेस्ट से पहले और उसके दौरान पार्टी का अंदरूनी संकट खुलकर सामने आया। एआईएडीएमके के एस. पी. वेलुमणि के नेतृत्व वाले खेमे ने सी. वी. षणमुगम के आवास पर बैठक के बाद विजय को समर्थन देने का एलान किया। पलानीस्वामी गुट इसके विरोध में था। क्योंकि भाजपा हर हाल में तमिलनाडु में विजय विरोधियों की सरकार बनाने की जिद में थी। एआईएडीएमके टूटे हुए गुट ने इसका पर्दाफाश भी किया और विजय को समर्थन देकर उस षड्यंत्र को चौपट भी। सियासी तौर पर यह केवल एआईएडीएमके की टूट नहीं थी, बल्कि भाजपा-समर्थित रणनीति की भी विफलता थी।
रीयल लाइफ हीरो
विजय को रोकने के लिए दो दिनों से वैकल्पिक सरकार की चर्चाएं तेज थीं। दो सीटों वाली वीसीके प्रमुख थोल तिरुमावलवन ने स्वयं दावा किया कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया था, ताकि विजय की टीवीके को सत्ता से दूर रखा जा सके। उन्होंने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। यहीं से तमिलनाडु की राजनीति में घटनाक्रम पलट गया। वीसीके ने विजय का साथ दिया। आईयूएमएल और वाम दल भी टीवीके सरकार के पक्ष में आए। कांग्रेस का समर्थन पहले ही विजय को नई राजनीतिक वैधता दे चुका था। इस तरह राहुल गांधी की सियासी सलाह और कांग्रेस के निर्णय ने विजय के लिए वह रास्ता खोला, जिससे पर्दे के इस हीरो ने भाजपा को बेपर्दा कर दिया।
भाजपा तमिलनाडु में सीधे सत्ता की दावेदार नहीं थी, लेकिन परोक्ष भूमिका के जरिये सत्ता-संतुलन को प्रभावित करना चाहती थी। विजय को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए छोटे दलों को आगे कर वैकल्पिक सरकार का रास्ता खोजा जा रहा था। परंतु प्रयोग सफल नहीं हो पाया। द्रविड़ अस्मिता, क्षेत्रीय स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और भाजपा-विरोधी चेतना ने मिलकर ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसे जोड़-तोड़ की राजनीति भेद नहीं सकी।
तमिलनाडु में विजय की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजभवन की देरी और राजनीतिक अनिश्चितता को समर्थन पत्रों और सदन के बहुमत से जवाब दिया है। जनता ने देखा कि एक नए राजनीतिक खिलाड़ी ने पुराने दिग्गज दलों और परदे के पीछे की रणनीतियों को सदन के भीतर मात दे दी। इस प्रकरण ने भाजपा की उस राजनीतिक शैली पर भी सवाल खड़े किए हैं, जिसमें विपक्षी सरकारों को अस्थिर करना, विधायकों को तोड़ना, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं को अपने पाले में लेना और साम-दाम-दंड-भेद से सत्ता तक पहुंचने के आरोप लगातार लगते रहे हैं।
जनादेश सर्वोपरि
तमिलनाडु का संदेश साफ है लोकतंत्र में अंतिम शक्ति संख्या, सदन और जनता के जनादेश की होती है। विजय ने अपने बहुमत से यह साबित किया कि यदि राजनीतिक पारदर्शिता, सामाजिक गठबंधन और सही समय पर सही रणनीति साथ आ जाए तो सत्ता के पुराने कुचक्र धराशायी हो सकते हैं। यह विजय की सरकार का आरंभ भर नहीं है, बल्कि भाजपा की रणनीतिक हार और तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति की नई घोषणा भी है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ एक सरकार का बहुमत नहीं है, बल्कि राजनीतिक रूप से दक्षिण भारत में भाजपा की रणनीतिक हार का संकेत भी है। सरकारों को तोड़ने, विधायकों को साधने और पर्दे के पीछे समीकरण बनाने की राजनीति इस बार विजय की पारदर्शी छवि और कांग्रेस-वाम समर्थन के सामने कमजोर पड़ती दिखी। तमिलनाडु ने संदेश दे दिया है कि यहां सत्ता साम-दाम-दंड-भेद से नहीं, जनभावना और क्षेत्रीय स्वाभिमान से तय होगी।

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