सामना संवाददाता / मुंबई
देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही कुछ घटनाएं केवल अपराध की खबरें नहीं हैं, बल्कि समाज की संवेदनहीन होती आत्मा का आईना हैं। कहीं मां पर अपनी ही ८ महीने की बच्ची को तेजाब पिलाने का आरोप है, कहीं ५ वर्षीय दिव्यांग मासूम की हत्या में माता-पिता पर संदेह है, तो कहीं एक महिला अपने दो छोटे बच्चों को बस में अकेला छोड़कर प्रेमी के साथ फरार हो जाती है। ये घटनाएं बताती हैं कि बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जगह, घर और परिवार ही कई बार उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही है।
राजस्थान के खैरथल-तिजारा जिले के भिवाड़ी क्षेत्र से सामने आई घटना ने लोगों को झकझोर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, एक मां ने मायके जाने की जिद पूरी न होने पर गुस्से में अपनी ८ महीने की मासूम बेटी को तेजाब पिला दिया। बच्ची को गंभीर हालत में अलवर के शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां दो दिन बाद उसकी मौत हो गई। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से भी ऐसी ही अमानवीय घटना सामने आई। हरसुल-सावंगी बायपास क्षेत्र के पास एक खेत में ५ वर्षीय दिव्यांग बच्चे का शव मिला। शुरुआती जांच में गला घोंटकर हत्या की आशंका जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चे के माता-पिता रोजगार की तलाश में आठ दिन पहले शहर आए थे। आशंका है कि आर्थिक तंगी और बच्चे की दिव्यांगता से परेशान होकर यह क्रूर कदम उठाया गया होगा।
तीसरी घटना महाराष्ट्र के बीड जिले से है। एक महिला अपने दो छोटे बच्चों को पंढरपुर-संभाजीनगर एसटी बस में अकेला छोड़कर प्रेमी के साथ स्कूटी से फरार हो गई। बच्चों की जेब में एक पर्ची रखी गई थी, जिसमें लिखा था कि इनके माता-पिता जीवित नहीं हैं और इन्हें यवतमाल की बस में बैठा दिया जाए। उसी पर्ची पर बच्चों के नाना का मोबाइल नंबर भी था। बस कंडक्टर ने बच्चों को अकेला और रोता देखकर पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद मामला सामने आया।
इन तीनों घटनाओं में एक समान पीड़ा है, मासूम बच्चे अपनों की क्रूरता, उपेक्षा और स्वार्थ का शिकार बने। यह समय केवल अपराधियों को सजा देने का नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन को चेतने का भी है। कानून हत्या, क्रूरता और परित्याग पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि बच्चा किसी की संपत्ति नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र जीवन है। जब ममता ही मौत में बदलने लगे, तब यह केवल परिवार की विफलता नहीं, पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है।
