श्रीकिशोर शाही
(बुंगा बुंगा – ८)
राजनीति के मैदान में सिल्वियो बर्लुस्कोनी की अचानक एंट्री ने पूरे इटली में एक ऐसा भूचाल ला दिया था, जिसकी उम्मीद बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों ने भी सपने में नहीं की थी। ‘फोर्जा इटालिया’ का विधिवत गठन हुए अभी मुश्किल से दो महीने ही बीते थे। इटली में आम चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और सिल्वियो के पास अपनी इस नई नवेली पार्टी को जनता के बीच स्थापित करने के लिए मात्र ६० दिनों का बेहद कम समय था। लेकिन सिल्वियो कोई पारंपरिक राजनेता नहीं थे, वे इटली के सबसे बड़े सेल्समैन थे, जिनके पास ‘मीडियासेट’ जैसे विशाल टीवी नेटवर्क का सबसे मारक हथियार मौजूद था।
इन ६० दिनों में इटली के मतदाताओं ने चुनाव प्रचार का वह हाई-टेक और आक्रामक रूप देखा, जो इससे पहले यूरोप में कभी नहीं देखा गया था। सिल्वियो ने रैलियों में लंबी भाषणबाजी करने के बजाय टीवी वैâमरों का सीधा इस्तेमाल किया। उनके प्रचार का तरीका बिल्कुल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों जैसा था। गहरे नीले रंग के सूट में चेहरे पर एक जादुई मुस्कान और परफेक्ट टेलीविजन मेकअप के साथ वह हर रोज इटली के ड्राइंग रूम में टीवी के जरिए हाजिर हो जाते। उन्होंने जनता को टैक्स कम करने और १० लाख नई नौकरियां देने का वह सुनहरा सब्जबाग दिखाया, जिसके आगे विपक्ष के सभी राजनेता बेहद फीके, थके हुए और पुराने ढर्रे के लगने लगे थे।
मार्च १९९४ में जब चुनाव के अंतिम नतीजे सामने आए तो पूरी दुनिया की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। सिर्फ ६० दिन पहले बनी ‘फोर्जा इटालिया’ ने इटली के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार कर दिखाया था। सिल्वियो बर्लुस्कोनी के गठबंधन ने शानदार बहुमत हासिल किया। यह विश्व राजनीति के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी। एक ऐसा अरबपति बिजनेसमैन, जिसने अपनी जिंदगी में कभी किसी नगर निगम का चुनाव नहीं लड़ा था, वह सीधे इटली का प्रधानमंत्री बन गया था।
मई १९९४ में बर्लुस्कोनी ने इटली के प्रधानमंत्री पद की ऐतिहासिक शपथ ली। रोम के सत्ता के गलियारों में अब एक ऐसे इंसान का राज था, जो लोकतंत्र को भी अपनी एक प्राइवेट कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चलाना चाहता था। हालांकि, राजनीतिक अनुभव की कमी और गठबंधन सहयोगियों से टकराव के कारण उनका यह पहला कार्यकाल बेहद छोटा रहा। महज सात महीने बाद ही दिसंबर १९९४ में उनकी सरकार गिर गई और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी।
(शेष अगले अंक में)
