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मोदी कार्यकाल की पड़ताल…12 साल…12 सवाल

सुलगते सवालों के घेरे में नरेंद्र मोदी का नए भारत का उदय

डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी

2014 से 2026 तक 12 साल का सफर पूरा कर चुके नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बन चुके हैं। समर्थक इसे “नए भारत का उदय” कहते हैं। आलोचक इसे “सवालों का दशक” मानते हैं। सवाल तो 12 दर्जन से भी ज्यादा है, लेकिन इन 12 सालों के हिसाब में 12 बड़े सवाल उठते हैं:
1. चीन से क्या मिला?
गलवान 2020 के 6 साल बाद भी एलएसी पर तनाव बरकरार है। आलोचकों का सवाल: “न आंख झुकने दी, न जमीन” का नारा तो मिला, पर सीमा पर चीनी बुनियादी ढांचे और घुसपैठ पर संसद में खुली बहस क्यों नहीं हुई?
2. मणिपुर कौन संभालेगा?
2023 से जल रहा मणिपुर 3 साल बाद भी पूरी तरह शांत नहीं। आलोचक पूछते हैं: प्रधानमंत्री ने महीनों बाद बयान दिया, पर केंद्र की “संघीय विफलता” की जिम्मेदारी किसकी?
3. रुपया क्यों गिरा?
12 साल में डॉलर के मुकाबले रुपया 60 से 98 पार कर गया। सवाल: “मजबूत भारत” की कहानी के बीच आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ कम क्यों नहीं हुआ?
4. पेट्रोल-डीजल की मार
अंतरराष्ट्रीय तेल सस्ता होने पर भी घरेलू दाम ऊपर ही रहे। देश के उपभोक्ता पूछते हैं: टैक्स घटाकर राहत क्यों नहीं दी गई? क्या उपभोक्ता सिर्फ राजस्व का जरिया है?
5. LPG सिलेंडर कहां पहुंचा?
उज्ज्वला योजना से करोड़ों कनेक्शन मिले, पर सिलेंडर 400 से 1000+ रुपये हुआ। सवाल: कनेक्शन तो मिला, पर रिफिल कराने की हिम्मत कितनों में बची?
6. रोजगार या भत्ता?
CMIE के आंकड़े बेरोजगारी पर सवाल उठाते हैं। बुद्धिजीवियों का तर्क: PMGKAY का मुफ्त राशन 80 करोड़ लोगों तक पहुंचा, पर ये “रोजगार न देने का विकल्प” बन गया। युवा नौकरी मांगे या भत्ते पर चुप हो जाए?
7. प्रेस कॉन्फ्रेंस कब?
12 साल में प्रधानमंत्री की एक भी स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं। सवाल: “मन की बात” एकतरफा है तो जनता की “मन की पीड़ा” कौन सुनेगा?
8. संसद में बहस या बहुमत?
अध्यादेश और कम समय में बिल पास होने का रिकॉर्ड बढ़ा। आलोचक पूछते हैं: लोकतंत्र बहस से चलता है या संख्या बल से?
9. एजेंसियों का इस्तेमाल?
विपक्षी नेताओं पर ED, CBI, UAPA की कार्रवाई तेज हुई। सवाल: ये भ्रष्टाचार पर वार है या असहमति को दबाने का हथियार?
10. विदेश नीति ‘व्यक्तिगत’ है क्या?
“Howdy Modi” से “नमस्ते ट्रंप” तक। हर एक नागरिक पूछता हैं: क्या भारत-अमेरिका रिश्ते अब संस्थागत कूटनीति से ज्यादा दो नेताओं की दोस्ती पर टिके हैं?
11. सामाजिक ताना-बाना कमजोर हुआ?
CAA-NRC, बुलडोजर राजनीति, लव जिहाद के मुद्दे। सवाल: 12 साल में समाज ज्यादा जुड़ा या “हम बनाम वो” में बंटा?
12. वादे बनाम हकीकत
2014 में 2 करोड़ नौकरी, 2022 तक हर घर को पानी, 15 लाख का वादा। देशवासी हिसाब मांग रहा हैं: घोषणाएं बड़ी थीं, जमीन पर नतीजे कितने?
भाजपा इन सवालों को “चुनावी हथकंडा” कहती है। सरकार का निठल्ला जवाब: चीन को सैन्य जवाब मिला, मणिपुर में शांति प्रक्रिया जारी है, मुफ्त राशन ने कोरोना में जान बचाई, मेक इन इंडिया-डिजिटल इंडिया ने भारत को 5वीं अर्थव्यवस्था बनाया।
12 साल लंबा समय है। इस दौरान भारत की सड़कें, हवाई अड्डे, डिजिटल पहचान बदली। पर देश के लिए ये 12 साल “बड़े वादे, अधूरे जवाब” की कहानी हैं। इतिहास फैसला करेगा कि ये कार्यकाल सत्ता में बने रहने का रिकॉर्ड था या देश के 140 करोड़ जनता की जिंदगी बदलने अथवा बर्बाद करने का।

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