तारिक अहमद
राजनीति में एक बड़ा प्रलोभन होता है संख्याओं को उपलब्धि बना देना। कितने दिन कुर्सी पर रहे, कितनी बार चुनाव जीते, कितने राज्यों में सरकार बनाई, कितनी रैलियां कीं। लेकिन इतिहास की अपनी एक अलग अदालत होती है। वहां पैâसला इस आधार पर नहीं होता कि कोई नेता कितने दिन सत्ता में रहा, बल्कि इस आधार पर होता है कि उसने उन दिनों में पद पर रहते हुए देश के लिए क्या किया।
अवधि ही उपलब्धि!
इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा अपने कार्यकाल को लेकर जिस तरह से विज्ञापन और प्रचार कराया जा रहा हैं, उनमें एक प्रमुख संदेश यह है कि वे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों की सूची में नॉन बायोलॉजिकल महामानव ऊपर पहुंच रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड के करीब या आगे निकल रहे हैं। वैâसा मूर्खतापूर्ण सपना है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बराबरी का सपना देखने वाले दृष्टि खोलकर देखें कि नेहरू ने क्या दिया और आपने क्या दिया। नफरत, जिसके सहारे आप बने हो, बाकी आपने देश को कुछ नही दिया। यह प्रचार अंधभक्तों की राजनीतिक दृष्टि से उपयोगी हो सकता है, लेकिन इतिहास को केवल वैâलेंडर के पन्नों से नहीं मापा जाता।
अगर केवल अवधि ही उपलब्धि है, तो फिर अनेक विचित्र रिकॉर्ड भी गिनाए जा सकते हैं। कोई पूर्व प्रधानमंत्री सबसे अधिक उम्र तक जीवित रहा, कोई सबसे अधिक उम्र में संसद पहुंचा, कोई व्हीलचेयर पर भी सक्रिय रहा, कोई नेता प्रतिपक्ष को देखकर भाग जाया करता था। क्या ये बातें अपने-आप में ऐतिहासिक महानता का प्रमाण हैं? शायद नहीं।
जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन इसलिए नहीं होता कि वे १५ अगस्त १९४७ से २७ मई १९६४ तक लगभग सत्रह वर्ष प्रधानमंत्री रहे। उनका मूल्यांकन इसलिए होता है कि उन्होंने उस दौर में क्या किया, जब देश विभाजन की आग से निकल रहा था, जब करोड़ों विस्थापितों का पुनर्वास होना था, जब ५०० से अधिक रियासतों को एक संघीय गणराज्य में जोड़ना था, जब लोकतंत्र की जड़ें रोपनी थीं, जब संविधान को व्यवहार में उतारना था और जब दुनिया दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बंटी हुई थी। आज कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि नेहरू को केवल १९५२ के चुनाव के बाद से गिना जाना चाहिए। यह तर्क इतिहास की समझ से अधिक राजनीतिक सुविधा का परिणाम लगता है। क्या १९४७ से १९५२ के बीच देश का शासन नहीं चल रहा था? क्या शरणार्थियों के पुनर्वास का काम नहीं हुआ? क्या रियासतों का विलय नहीं हुआ? क्या कश्मीर पर पहला युद्ध नहीं लड़ा गया? क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव नहीं रखी गई?
विचारों के नेता!
१५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतंत्र हुआ और उसी दिन से नेहरू जी स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री बने। यह कोई अंतरिम या `एड-हॉक’ व्यवस्था नहीं थी। देश उन्हीं के नेतृत्व में चल रहा था। कश्मीर संकट हो, हैदराबाद और जूनागढ़ का प्रश्न हो, विदेश नीति की दिशा तय करनी हो या प्रथम आम चुनाव की तैयारी इन सबके केंद्र में वही सरकार थी।
नेहरू की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे केवल सत्ता के नेता नहीं थे, विचार के भी नेता थे। उनकी किताबें आज भी पढ़ी जाती हैं। उनकी विदेश नीति पर आज भी बहस होती है। उनके निर्णयों की आलोचना भी होती है और प्रशंसा भी। लेकिन उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। इतिहास में वही लोग टिकते हैं, जिनके पक्ष और विपक्ष दोनों में गंभीर तर्क मौजूद हों। यह भी सच है कि नेहरू से गलतियां हुर्इं। चीन युद्ध उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक विफलता माना जाता है। लेकिन इतिहास केवल सफलताओं का लेखा-जोखा नहीं रखता। वह यह भी देखता है कि किसी नेता ने संकटों का सामना वैâसे किया, संस्थाएं वैâसी बनार्इं और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या विरासत छोड़ी? नेहरू जी के द्वारा बनाए गए संस्थानों को बेच रहे हैं।
मूल्यांकन की असली कसौटी
नरेंद्र मोदी का मूल्यांकन भी अंतत: इसी कसौटी पर होगा। यह नहीं देखा जाएगा कि उन्होंने कितने दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली, बल्कि यह देखा जाएगा कि उनके शासन में देश की सामाजिक एकता कहां पहुंची, लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी मजबूत हुर्इं, बेरोजगारी और महंगाई का क्या हुआ, शिक्षा और स्वास्थ्य में क्या परिवर्तन आए और भारत की वैश्विक स्थिति कितनी मजबूत हुई।
अखबारों में छपे पूरे पन्ने के विज्ञापन अगले दिन रद्दी में चले जाते हैं। प्रचार का जीवन बहुत छोटा होता है। इतिहास का जीवन बहुत लंबा होता है। आज जो नारे हैं, वे कल भुला दिए जाएंगे। लेकिन जो संस्थाएं बनती हैं, जो विचार जन्म लेते हैं, जो किताबें लिखी जाती हैं, जो संघर्ष किए जाते हैं और जो राष्ट्र निर्माण के काम होते हैं, वे पीढ़ियों तक याद रहते हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि कौन नेहरू से ज्यादा दिन प्रधानमंत्री रहा या रहेगा। सवाल यह है कि कौन नेहरू की तरह ऐसा काम कर पाएगा, जिसके बारे में साठ-सत्तर साल बाद भी लोग बहस कर रहे हों। कुर्सी पर बैठने के दिनों का रिकॉर्ड बनाना आसान है। इतिहास में जगह बनाना कठिन है और इतिहास की किताबों में जगह विज्ञापनों से नहीं, काम से मिलती है।
(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
