श्रीकिशोर शाही
(बुंगा बुंगा – ९)
१९९४ की करारी हार और महज सात महीने में प्रधानमंत्री की कुर्सी छिन जाने के बाद, इटली के तमाम बड़े राजनीतिक पंडितों ने यह मान लिया था कि सिल्वियो बर्लुस्कोनी का राजनीतिक अध्याय अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। लेकिन सिल्वियो उस मिट्टी के नहीं बने थे, जो एक हार से टूट जाएं। अपनी पूरी ताकत, अपार दौलत और टेलीविजन चैनलों के विशाल साम्राज्य का निर्दयी इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने २००१ के आम चुनावों में एक ऐसी तूफानी वापसी की, जिसने उनके सभी विरोधियों को पूरी तरह धूल चटा दी। इस बार वह पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर, आक्रामक और अजेय होकर सत्ता के सिंहासन पर लौटे थे। इटली के लोग अब उन्हें प्यार से ‘कावलियरे’ (शूरवीर) कहकर बुलाने लगे थे।
सत्ता में लौटते ही सिल्वियो बर्लुस्कोनी ने कुछ ऐसा किया जो इटली के लोकतंत्र के इतिहास में बेहद खौफनाक था। उन्होंने अपने निजी व्यापार (मीडियासेट) और देश की राजनीति के बीच की वह बची-खुची रेखा भी पूरी तरह मिटा दी। इटली के प्राइवेट टीवी चैनलों पर उनका पहले से ही पूर्ण एकाधिकार था और अब प्रधानमंत्री बनने के बाद इटली का सरकारी टीवी नेटवर्क भी सीधे उनके अधीन आ गया था। इस तरह पूरे इटली के लगभग ९० प्रतिशत टेलीविजन और समाचारों पर केवल एक ही इंसान का नियंत्रण था।
लेकिन सत्ता के दुरुपयोग का असली खेल तो इसके बाद शुरू हुआ। बर्लुस्कोनी के खिलाफ अदालत में भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी और जजों को रिश्वत देने के दर्जनों गंभीर मुकदमे चल रहे थे। इन आपराधिक मुकदमों से खुद को बचाने के लिए उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत का नंगा और बेशर्म दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। उन्होंने संसद में अपनी पार्टी के भारी बहुमत का इस्तेमाल करते हुए ऐसे कानून पास करवाने शुरू किए, जो पूरे इटली की जनता के लिए नहीं, बल्कि केवल उन्हें जेल जाने से बचाने के लिए बनाए गए थे। इन स्वार्थी कानूनों को इटली में ‘एड पर्सोनम’ कहा गया। कभी अपने खिलाफ गवाही देने वालों को कमजोर करने वाला कानून तो कभी अपने ही मुकदमों की समय-सीमा घटाने वाला कानून। लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर में बैठकर एक प्रधानमंत्री अपने ही अपराधों को धोने के लिए कानून की किताब के पन्नों को अपनी मर्जी से फाड़ रहा था। ताकत का यह नशा अब पूरी तरह बर्लुस्कोनी के सिर चढ़कर बोलने लगा था और यही बेलगाम नशा उन्हें जल्द ही एक ऐसी अंधेरी और रंगीन खाई की तरफ धकेलने वाला था, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
(शेष अगले अंक में)
