मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : बोली, बखेड़ा और बेशर्मी का लोकतांत्रिक उत्सव!

महाराष्ट्रनामा : बोली, बखेड़ा और बेशर्मी का लोकतांत्रिक उत्सव!

 राजन पारकर

‘जहां विचारों की नहीं, इशारों की कीमत लगती है; जहां निष्ठा की नहीं, निविदा की चर्चा होती है, वहां लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक मंडी लगती है!’
गीते ने खोल दी सत्ता के सौदागरों की दुकान
नासिक की विधान परिषद सीट पर चुनाव कम और समझौते की पंचायत ज्यादा दिखाई दे रही है। गोकुल गीते ने जिस तरह ‘ऑफर’ और ‘मनाने की कोशिशों’ का खुलासा किया है, उससे सवाल उठता है कि यह लोकतंत्र का चुनाव है या किसी राजनीतिक शेयर बाजार का ट्रेडिंग सत्र? एक तरफ महायुति का अधिकृत उम्मीदवार, दूसरी तरफ बागी तेवर वाले गीते। मंत्री समझाने पहुंच रहे हैं, फोन पर बुलावे आ रहे हैं, दिल्ली के दरवाजे खुल रहे हैं। जनता पूछ रही है, उम्मीदवार को मनाया जा रहा है या हटाया जा रहा है?
आचार्य अत्रे होते तो लिखते – ‘जब उम्मीदवार को जनता नहीं, मंत्री समझाने लगें तो समझ लीजिए चुनाव नहीं, हिसाब-किताब चल रहा है।’
‘ब्लू स्टार’ पर संकटमोचक महाजन खुद संकटग्रस्त!
गिरीश महाजन ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को लेकर जो टिप्पणी की, उसने राजनीतिक गलियारों में ऐसा विस्फोट किया कि पार्टी को तुरंत हाथ झाड़ने पड़े। जो नेता कल तक संकटमोचक कहलाते थे, वे आज खुद सफाई देने की स्थिति में आ गए हैं।
राजनीति में शब्द तीर से भी ज्यादा घातक होते हैं। महाजन ने भावनाओं में बहकर जो कहा, उसका राजनीतिक अर्थ निकालने वालों की कमी नहीं थी। नतीजा- दिल्ली नाराज, विरोधी खुश और पार्टी असहज।
‘राजनीति में जुबान फिसले तो आदमी नहीं गिरता, पूरा दल लुढ़क जाता है।’
और यह भी – ‘नेता जब इतिहास पढ़े बिना इतिहास पर भाषण देता है, तब विवाद पैदा नहीं होता; विवाद उसका स्थायी साथी बन जाता है।’
‘पैसे बिना वोट नहीं!’ चुनावी बाजार की पोल
हेमंत पाटील ने विधान परिषद चुनाव को लेकर जो टिप्पणी की है, उसने सत्ता पक्ष की नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उनका कहना है कि यह चुनाव अब जनप्रतिनिधियों का नहीं, धनप्रतिनिधियों का हो गया है।
जब सत्तारूढ़ गठबंधन का ही विधायक कहे कि ‘सब पैसे लेकर वोट देंगे’, तब विपक्ष को आरोप लगाने की जरूरत ही क्या रह जाती है? यह बयान लोकतंत्र के चेहरे पर लगा वह आईना है, जिसमें हर दल अपना असली चेहरा देखने से डरता है।
‘जब विधायक खुद कहने लगे कि वोट का मूल्य विचार नहीं, व्यापार है; तब लोकतंत्र की अर्थी को कंधा देने वाले भी वही लोग होते हैं जो उसे बचाने की शपथ लेते हैं।’
और आगे – ‘यह चुनाव नहीं, नोटों की बरसात में भीगती हुई नैतिकता का अंतिम संस्कार है।’
‘विधान परिषद या विधान ‘परिसौदा’?’
एक उम्मीदवार कहता है- मुझे हटाने की कोशिश हो रही है।
दूसरा नेता कहता है- मेरी बात से पार्टी नाराज है।
तीसरा विधायक कहता है- पैसे बिना वोट नहीं पड़ेंगे।
जनता यह सब सुन रही है और मुस्कुरा रही है। क्योंकि उसे अब समझ में आ गया है कि ‘नेता चुनाव लड़ते हैं सत्ता के लिए, दल लड़ते हैं हिस्सेदारी के लिए, और जनता हर बार लड़ती है अपनी समझदारी बचाने के लिए।’
‘लोकतंत्र का मंदिर अभी खड़ा है, मगर उसके पुजारियों ने उसे बाजार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी!’

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