-न्यूट्रास्यूटिकल्स और दवाओं का मायाजाल
मनमोहन सिंह
सुबह की शुरुआत आजकल ताजे फल या भीगे बादाम से कम और टेबल पर रखे चमकीले, रंग-बिरंगे प्लास्टिक के डिब्बों से ज्यादा होने लगी है। खट से ढक्कन खुलता है और हथेली पर गिरती हैं, एक नीली, एक पीली और दो सफेद गोलियां। सोशल मीडिया या फिर टीवी चैनलों पर परफेक्ट बॉडी और ग्लोइंग स्किन वाले इन्फ्लुएंसर या मॉडल मुस्कुराते हुए पूछते हैं, ‘क्या आपकी डाइट आपको पूरा पोषण दे रही है?’ बस, यहीं से शुरू होता है ‘डर का वो धंधा’ जो हर भले-चंगे और स्वस्थ इंसान को बीमार होने का अहसास दिला देता है।
हम अपनी रसोई की थाली से ज्यादा इन गोलियों पर भरोसा करने लगे हैं। लेकिन जब अरबों डॉलर के इस न्यूट्रास्यूटिकल साम्राज्य का चेहरा सामने आता है तो पता चलता है कि ये कंपनियां सेहत कम और ‘बीमार होने का डर’ ज्यादा बेच रही हैं।
आखिर क्या हैं ये न्यूट्रास्यूटिकल्स?
‘न्यूट्रास्यूटिकल’ शब्द न्यूट्रिशन (पोषण) और फार्मास्यूटिकल (दवा) से मिलकर बना है। सरल शब्दों में कहें, तो यह ऐसा खाद्य पदार्थ है जो शरीर को पोषण देने के साथ-साथ बीमारियों से बचाने या उनके इलाज का दावा करता है। इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है।
डाइटरी सप्लीमेंट्स: विटामिन्स, मिनरल्स, एमीनो एसिड्स के वैâप्सूल या पाउडर।
फंक्शनल फूड्स: सामान्य भोजन (जैसे फोर्टिफाइड दूध या ओट्स) जिनमें अलग से पोषक तत्व जोड़े जाते हैं।
मेडिसिनल फूड्स: विशेष बीमारियों में डॉक्टर की देखरेख में दिया जाने वाला खास आहार।
बाजार का आकार और दावों का कड़वा सच
आज वैश्विक स्तर पर न्यूट्रास्यूटिकल्स का बाजार आसमान छू रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मार्केट ४०० बिलियन (अरब) डॉलर से अधिक का हो चुका है। कंपनियां यह नैरेटिव सेट करती हैं कि आधुनिक भोजन की गुणवत्ता खराब हो चुकी है इसलिए सप्लीमेंट्स लेना जरूरी है। लेकिन दवाओं की तरह इन्हें बाजार में आने से पहले कड़े क्लिनिकल ट्रायल्स से नहीं गुजरना पड़ता। नियामक संस्थाएं (जैसे भारत में एफएसएसएआई या अमेरिका में एफडीए) इन्हें ‘दवा’ नहीं, बल्कि ‘खाद्य पदार्थ’ की श्रेणी में रखती हैं और इसी ढील का फायदा उठाकर कंपनियां बड़े-बड़े दावे करती हैं। ग्लोबल स्तर पर हुई कई रिसर्च इन चमकीले डिब्बों की पोल खोलती हैं।
लेबल की धोखाधड़ी: अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, कई सप्लीमेंट्स में लिखे गए तत्वों की वास्तविक मात्रा डिब्बे पर छपे दावों से बिल्कुल अलग होती है। कुछ में एक्टिव इनग्रेडिएंट मात्र १० प्रतिशत था, तो कुछ में इसकी मात्रा इतनी ज्यादा थी कि वो शरीर के लिए जहरीली साबित हो सकती थी।
‘एक्सपेंसिव यूरिन’ (महंगा यूरिन): हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग की रिसर्च बताती है कि प्राकृतिक भोजन (फल-सब्जियां) से मिलने वाले विटामिन्स को हमारा शरीर आसानी से सोख लेता.है। इसके विपरीत, लैब में बने सिंथेटिक विटामिन्स को शरीर अवशोषित ही नहीं कर पाता और वह यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाता है। वैज्ञानिक मजाक में इसे ही ‘महंगा यूरिन’ कहते हैं।
ऑर्गन डैमेज का खतरा: यूएस नेशनल इंस्टाट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार, बिना डॉक्टरी सलाह के विटामिन्स और हैवी प्रोटीन शेक का अंधाधुंध सेवन लीवर और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। पैâट-सॉल्युबल विटामिन (ए,डी,ई,के) शरीर से आसानी से बाहर नहीं निकलते और लीवर में जमा होकर उसे फेल तक कर सकते हैं।
सप्लीमेंट्स: कब पड़ती है जरूरत?
चिकित्सा विज्ञान सप्लीमेंट्स को पूरी तरह खारिज नहीं करता, लेकिन इसका एक सख्त दायरा है। बिना जांच के लिया गया सप्लीमेंट शरीर में टॉक्सिसिटी (जहर) बढ़ा सकता है और पैसों की सरासर बर्बादी है। लेकिन मेडिकल इमरजेंसी या गंभीर कमी होने पर डॉक्टर की सलाह से इन्हें लेना बेहद जरूरी हो जाता है।
विटामिन डी और बी१२ की कमी: आज की इनडोर लाइफस्टाइल के कारण एक बड़ी आबादी में विटामिन डी और शुद्ध शाकाहारी लोगों में बी १२ की भारी कमी देखी जा रही है, जिसे केवल सामान्य भोजन से ठीक करना मुश्किल होता है।
गर्भावस्था: होने वाले बच्चे के दिमागी विकास के लिए गर्भवती महिलाओं को ‘फॉलिक एसिड’ और आयरन की सप्लीमेंटेशन बेहद जरूरी होती है।
बुजुर्ग और विशेष बीमारियां: उम्र बढ़ने के साथ जब शरीर भोजन से पोषक तत्व खींचना बंद कर देता है, तब कैल्शियम और अन्य माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स हकीकत बन जाते हैं।
डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर की गाइडलाइंस स्पष्ट कहती हैं कि यदि आप एक स्वस्थ, सक्रिय इंसान हैं और आपकी थाली में दाल, रोटी, हरी सब्जियां, सलाद, दही और मौसमी फल शामिल हैं तो आपको किसी भी चमकीले डब्बे वाली गोली की कोई जरूरत नहीं है।
बाजार आपके डर और असुरक्षा की भावना पर फल-फूल रहा है। विज्ञापनों के बहकावे में आकर अपनी गाढ़ी कमाई और सेहत को दांव पर लगाने से बेहतर है कि हम अपनी पारंपरिक भारतीय थाली की तरफ लौटें। गोलियों से नहीं, असली भोजन से अपनी थाली को रंग-बिरंगा बनाइए, क्योंकि सेहत किसी फैक्ट्री में डिब्बाबंद नहीं होती, वह आपकी रसोई में तैयार होती है।
