मुख्यपृष्ठसमाचारप्रधानमंत्री की अपील को सरकारी तंत्र का ठेंगा?

प्रधानमंत्री की अपील को सरकारी तंत्र का ठेंगा?

राजन पारकर / मुंबई

“ईंधन बचाएं, सादगी अपनाएं” के संदेश के बीच मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में 12 करोड़ की चमक-दमक पर उठे सवाल!

देश में बढ़ती महंगाई, वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और तेल की चिंता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सादगी अपनाने, अनावश्यक खर्च रोकने और ईंधन बचाने की अपील की है। लेकिन मुंबई में आयोजित होने जा रहे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की तैयारियों को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह संदेश सरकारी आयोजनों पर भी लागू होता है?
मुंबई में आयोजित होने वाला Festival 2026 आगामी 15 जून से 21 जून 2026 तक चलेगा। इस आयोजन में Documentary, Short Fiction, Animation और WAVES Doc Bazaar जैसे विभागों के माध्यम से दुनिया भर की फिल्मों को मंच दिया जाएगा।
फिल्म और संस्कृति को बढ़ावा देना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब सरकारी संसाधनों और जनता के पैसों से होने वाले आयोजनों में खर्च की सीमा और प्राथमिकताओं पर चर्चा शुरू होती है।
सूत्रों के अनुसार मुंबई इंटरनॅशनल फिल्म फेस्टिवल(MIFF )आयोजन के लिए लगभग 12 करोड़ रुपये के बजट की चर्चा है। आयोजन की जिम्मेदारी जनरल मैनेजर डी. रामकृष्ण और मैनेजिंग डायरेक्टर एमडी प्रकाश मगदूम के नेतृत्व में बताई जा रही है।
बताया जा रहा है कि समारोह में 100 से अधिक विदेशी मेहमानों के आने की तैयारी है। उनके ठहरने के लिए होटल ट्राइडेंट के आसपास लगभग 150 कमरों की बुकिंग किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। वहीं मेहमानों की आवाजाही के लिए 100 से अधिक किराये की गाड़ियों की व्यवस्था की चर्चा है।

सबसे बड़ा सवाल-
जब प्रधानमंत्री ईंधन बचाने और सादगी अपनाने की अपील कर रहे हैं, तो सरकारी आयोजनों में इतनी बड़ी वाहन व्यवस्था क्यों? एक तरफ आम नागरिक से कहा जाता है कि जरूरत के अनुसार वाहन चलाएं, पेट्रोल-डीजल बचाएं और खर्च में संयम रखें। दूसरी तरफ सरकारी आयोजनों में वीआईपी सुविधाओं पर बड़े खर्च की चर्चा जनता के सामने विरोधाभास पैदा करती है।

महाराष्ट्र सरकार के सांस्कृतिक व चित्रपट विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल
मुंबई इंटरनॅशनल फिल्म फेस्टिवल(MIFF) जैसे आयोजनों को महाराष्ट्र सरकार के सांस्कृतिक व चित्रपट विभाग की ओर से सहयोग मिलने की व्यवस्था रही है। रविंद्र नाट्य मंदिर जैसे सांस्कृतिक केंद्रों में उद्घाटन, ओपनिंग और क्लोजिंग समारोहों के लिए भी सरकारी स्तर पर सहयोग दिया जाता है।
जब सरकारी विभाग सीधे तौर पर ऐसे आयोजनों से जुड़े होते हैं, तब जनता की अपेक्षा और भी बढ़ जाती है कि हर खर्च में पारदर्शिता हो और प्रधानमंत्री के सादगी व बचत के संदेश का पालन सबसे पहले सरकारी व्यवस्था में दिखाई दे।

जनता पूछ रही है-
“बचत और सादगी का संदेश केवल आम आदमी के लिए है या सरकार के अपने आयोजनों के लिए भी?”
सरकारी खजाना किसी की निजी सुविधा नहीं, बल्कि जनता की मेहनत की कमाई है।MIFF कला का उत्सव बने, संस्कृति का उत्सव बने… लेकिन जनता के पैसों की चमक-दमक का प्रदर्शन न बने।लोकतंत्र में सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग है।

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