रामदिनेश यादव
भारत का चुनाव आयोग दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित चुनावी संस्थाओं में गिना जाता रहा है। उसकी साख इस आधार पर बनी कि उसने सरकारों से ऊपर उठकर संविधान की भावना के अनुरूप काम किया। यदि आज महाराष्ट्र में उनकी अनदेखी और उसकी चुप्पी या उसकी असक्रियता पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं, तो आयोग के लिए यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनाव के बीच लागू आदर्श आचार संहिता के दौरान राज्य सरकार द्वारा छात्रों के लिए शैक्षणिक सुविधाओं, किसानों की कथित कर्जमाफी और नासिक कुंभ मेले से जुड़े तपोवन विकास के लिए हजारों करोड़ रुपए की आर्थिक मंजूरी की खबरें खयलकर चल रही है। सवाल उठने लगा है कि जब आचार संहिता लागू थी, तब ऐसे नीतिगत निर्णयों की जानकारी सार्वजनिक वैâसे हुई और किसने इसे मीडिया तक पहुंचाया?
मुद्दा केवल इन योजनाओं का नहीं है। छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं, किसानों की राहत या धार्मिक आयोजन के लिए बुनियादी ढांचे के विकास का विरोध शायद ही कोई राजनीतिक दल करेगा। पर असली सवाल यह है कि क्या चुनावी प्रक्रिया के दौरान सरकारी निर्णयों का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है? और यदि ऐसा प्रतीत हो रहा है, तो क्या चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सक्रिय दिखाई दे रहा है?
लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं पर जनता के विश्वास से चलता है जो चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करती हैं। यदि चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों का समय पर और पारदर्शी जवाब नहीं दिया गया, तो नुकसान किसी एक राजनीतिक दल का नहीं बल्कि लोकतंत्र में जनता के भरोसे का होगा।
इसलिए महाराष्ट्र के इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास की रक्षा के लिए भी जरूरी है। चुनाव आयोग को स्पष्ट करना होगा कि आचार संहिता के दौरान हुई इन घोषणाओं और उनके प्रचार-प्रसार के मामले में क्या नियम लागू होते हैं और क्या किसी प्रकार की कार्रवाई की जाएगी। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है, और जब वही डगमगाने लगे तो खतरे की घंटी बजना स्वाभाविक है।
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पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। विपक्षी दलों ने कई मौकों पर आरोप लगाया कि आयोग सत्ता पक्ष के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया अपनाता है। भले ही चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा हो, लेकिन लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं होता, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
यही वह बिंदु है जहां चिंता गहराती है।
नासिक क्षेत्र में चुनावी समीकरण बदलते दिखाई देने पर तपोवन परियोजना के लिए लगभग २,००० करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई और उसके बाद किसानों के लिए ३६ हजार करोड़ रुपए की कर्जमाफी की घोषणा सामने आई। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि सरकार की बैठकों में यह कहा गया था कि आचार संहिता के कारण ऐसे निर्णय सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे, तो फिर उनकी विस्तृत जानकारी मीडिया तक वैâसे पहुंची? इसके लिए दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?
