संतोषी रावत
-एक नास्तिक सरकार की आस्तिक चाल
-नकली दलाई लामा से अमेरिका परेशान
यह कहानी हिमालय की उन ऊंचाइयों से शुरू होती है, जहां अध्यात्म की गूंज दुनिया को शांति का संदेश देती है। लेकिन आज उसी शांति के पीछे एक ऐसा कूटनीतिक तूफान मंडरा रहा है, जिसने वॉशिंगटन से लेकर बीजिंग और नई दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी लॉमेकर माइकल मैककॉल की चेतावनी ने इस छिपे हुए खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है कि अगर हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, तो चीन एक नकली दलाई लामा को सामने लाएगा। लेकिन एक नास्तिक कम्युनिस्ट सरकार एक आध्यात्मिक गुरु के पुनर्जन्म में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है और अमेरिका को इससे क्या तकलीफ है, इसे समझना जरूरी है।
तिब्बत पर कब्जा और चीन की पुरानी साजिश
कहानी का पहला अध्याय साल १९५०-५१ का है, जब चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा कर लिया था। इसके बाद १९५९ में दलाई लामा को अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी। तब से चीन ने तिब्बत की अनूठी संस्कृति, बौद्ध धर्म और सामाजिक ताने-बाने को कुचलने की हर संभव कोशिश की है। हाल ही में चीन ने जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून लागू किया है, जो असल में तिब्बतियों को पूरी तरह चीनी रंग में रंगने की एक चाल है। चीन जानता है कि तिब्बती समाज का दिल दलाई लामा में बसता है, इसलिए वह उनके सामाजिक और धार्मिक प्रभाव को पूरी तरह खत्म करना चाहता है।
धार्मिक दखलअंदाजी
इस कहानी का सबसे अजीब और विवादित मोड़ २००७ में आया, जब खुद को आधिकारिक तौर पर नास्तिक मानने वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने एक कानून पारित किया। इस कानून के तहत चीन ने यह तय करने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया कि तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं यानी लामाओं का पुनर्जन्म कहां और वैâसे होगा। चीन की योजना बिल्कुल साफ है कि वर्तमान १४वें दलाई लामा के बाद बीजिंग अपनी पसंद के एक कठपुतली या नकली दलाई लामा को गद्दी पर बिठा देगा। यह नया चेहरा तिब्बती लोगों के प्रति नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार होगा, जिससे तिब्बत के भीतर विरोध की हर आवाज को हमेशा के लिए दबाया जा सके।
अमेरिका को तकलीफ और सुरक्षा की चिंता
अमेरिका के लिए यह सिर्फ किसी धर्म का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि उसकी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है। अमेरिका की तकलीफ यह है कि अगर चीन अपनी पसंद का दलाई लामा चुनने में कामयाब हो गया, तो वह पूरे हिमालयी क्षेत्र पर अपना शिकंजा कस लेगा। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिका ने २०२० में तिब्बती नीति और समर्थन अधिनियम पास किया था। अब अमेरिकी लॉमेकर माइकल मैककॉल ने इसमें एक नया संशोधन पेश किया है जो साफ करता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना पूरी तरह से तिब्बती बौद्ध गुरुओं का धार्मिक मामला है और इसमें बीजिंग की कोई भूमिका नहीं हो सकती।
हिंदुस्थान को चेतावनी और रणनीतिक असर
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा और सीधा असर हिंदुस्थान पर पड़ने वाला है। हिंदुस्थान और चीन के बीच पहले से ही वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर तनाव की स्थिति बनी रहती है। वर्तमान दलाई लामा का कहना है कि उनका पुनर्जन्म किसी आजाद देश में होगा, चीन में नहीं। यदि चीन एक नकली दलाई लामा को खड़ा करता है, तो वह नेपाल, मंगोलिया और सीधे भारत की सीमाओं जैसे लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के पास रहने वाली बौद्ध आबादी को प्रभावित करने के लिए उसका इस्तेमाल करेगा। यह हिंदुस्थान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधी चुनौती है क्योंकि चीन इस नकली आध्यात्मिक नेता के जरिए हिंदुस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में अशांति फैला सकता है।
इस कहानी का अंत अभी बाकी है। १४वें दलाई लामा ने मुस्कुराते हुए कहा है कि वे ११० साल तक जीने की योजना बना रहे हैं, लेकिन लोकतांत्रिक दुनिया उनके बाद के समय को लेकर चुप नहीं बैठ सकती। यह लड़ाई सिर्फ एक पद की नहीं है, बल्कि यह एक पूरी संस्कृति के वजूद, धार्मिक स्वतंत्रता और पूरे एशिया में शक्ति संतुलन को बचाए रखने की जंग है।
