जीने की कहानी

दावा नहीं करती दवा,
रोग मिटाने का कभी,
दुआ काम करती है वहां,
बस दो मीठे बोल लिए।

पता चल जाता है,
कौन अपना, कौन पराया,
बोल ही तो होते हैं,
शख्सियत का आईना।

झूठ-फरेब के रिश्ते-नाते,
न कोई अपना, न पराया,
मतलब की दुनिया में,
मोहरा बनाते अपने ही।

चित्त और मात होती,
जहां उन्हीं के मुताबिक,
किस पर करें भरोसा,
किसको मानें अपना यहां।

हैं हम भी तो आखिर,
उसी भीड़ में शामिल,
उंगली किसी ओर करते हैं,
तो चार अपनी ओर होती हैं।

इसलिए न हो शिकवा,
न रखें गिला किसी से,
जो लिया, यहीं से लिया,
जो खोया, यहीं का होगा।

चार दिन की जिंदगानी है,
हंस-खिलकर जी लें इसे,
यही तो जीवन की रवानी है,
यही जीने की कहानी है।

मुनीष भाटिया / ऐरो सिटी मोहाली

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