एड. कनई बिस्वास
न्याय व्यवस्था तभी मजबूत रहती है जब अदालत के आदेशों का पालन हो और न्याय प्रक्रिया का सम्मान किया जाए। यदि कोई व्यक्ति अदालत की कार्यवाही में बाधा डालता है, आदेशों की अवहेलना करता है या सजा से बचने की कोशिश करता है, तो कानून इसे गंभीर अपराध मानता है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा ९४, ९५ और ९६ इसी प्रकार के अपराधों को स्पष्ट करती हैं।
केस स्टडी – १: ‘अदालत की कार्यवाही में बाधा’ (धारा ९४)
एक व्यक्ति ने अदालत में सुनवाई के दौरान हंगामा किया, जज के निर्देशों की अनदेखी की और कार्यवाही रोकने की कोशिश की।
अदालत क्या देखेगी?
क्या कार्यवाही में जानबूझकर बाधा डाली गई? क्या अदालत की गरिमा को ठेस पहुंची? क्या इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हुई?
फैसला – यह अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने का अपराध है। समझें: धारा ९४ के तहत न्यायालय की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करना या उसकी गरिमा को नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है।
केस स्टडी – २: ‘अदालत के आदेश का उल्लंघन’ (धारा ९५)
एक व्यक्ति को अदालत ने किसी क्षेत्र में प्रवेश करने से रोका था, लेकिन उसने आदेश की अनदेखी करते हुए वहां जाना जारी रखा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आदेश वैध और स्पष्ट था? क्या आरोपी को आदेश की जानकारी थी? क्या उल्लंघन जानबूझकर किया गया?
फैसला – यह अदालत के आदेश का उल्लंघन है। समझें: धारा ९५ के अनुसार न्यायालय के वैध आदेशों की अवहेलना करना अपराध माना जाता है।
केस स्टडी – ३: ‘सजा से बचने का प्रयास’ (धारा ९६)
एक दोषी व्यक्ति अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद फरार हो गया और लंबे समय तक छिपता रहा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी जानबूझकर फरार हुआ? क्या उसका उद्देश्य सजा से बचना था? क्या उसने कानून से बचने की कोशिश की?
फैसला – यह सजा से बचने का अपराध है। समझें: धारा ९६ के तहत अदालत द्वारा निर्धारित दंड से बचने के लिए फरार होना या छिपना दंडनीय अपराध है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि अदालत के आदेश केवल सलाह नहीं, बल्कि कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना या सजा से बचने का प्रयास कानून की नजर में गंभीर अपराध है। यानी, कानून से भागना आसान नहीं है और न्याय व्यवस्था का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
(अगले अंक में: धारा ९७, ९८ और ९९ – ‘आत्मरक्षा का अधिकार और उसकी सीमाएं’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)
