मनमोहन सिंह
पंजाब की सियासत में पारंपरिक रूप से हाशिए पर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को घेरने के लिए एक बेहद सोची-समझी और बहुआयामी रणनीति तैयार कर रही है। शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद, भाजपा राज्य में एक जूनियर पार्टनर की भूमिका से बाहर निकलकर मुख्य विपक्षी और भविष्य के विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करना चाहती है। इसके लिए पार्टी मुख्य रूप से तीन स्तरों पर काम कर रही है।
सामाजिक और धार्मिक डेरों तक पहुंच
पंजाब की राजनीति में डेरा संस्कृति का गहरा प्रभाव है। भाजपा ‘आप’ के पारंपरिक और दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए इन डेरों का सहारा ले रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जालंधर के डेरा सचखंड बल्लां का दौरा करना और संत निरंजन दास से मुलाकात करना इसी रणनीति का हिस्सा है, जिससे दोआबा क्षेत्र के बड़े रविदासिया (दलित) समुदाय को साधा जा सके। इसके अलावा, हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों व शीर्ष नेताओं द्वारा राधा स्वामी सत्संग ब्यास और डेरा सच्चा सौदा जैसे बड़े संप्रदायों के प्रमुखों से मुलाकातें बढ़ाना, सीधे तौर पर ‘आप’ के जमीनी आधार को कमजोर करने की कोशिश है।
सिखों और पंथिक ताकतों के प्रति नरम रुख
भाजपा अपनी पारंपरिक ‘हिंदू-केंद्रित’ छवि को बदलकर सिख समुदाय के बीच पैठ बनाने की नई रणनीति पर चल रही है। इसके तहत पार्टी के नेता कट्टरपंथियों और पंथिक संगठनों के प्रति एक अलग दृष्टिकोण अपना रहे हैं। महाराष्ट्र के भाजपा मंत्री द्वारा स्वर्ण मंदिर के मेहता चौक (दमदमी टकसाल) में जाकर ऑपरेशन ब्लू स्टार के लड़ाकों को सार्वजनिक रूप से ‘शहीद’ कहना इसी बदली हुई रणनीति का संकेत है। इसके जरिए भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह सिखों की धार्मिक भावनाओं और उनके इतिहास के प्रति संवेदनशील है, जिससे ‘आप’ को घेरने के लिए एक नया नैरेटिव तैयार किया जा सके।
‘आप’ के सामने बड़ी चुनौतियां
भाजपा की इस आक्रामक और बहुआयामी घेराबंदी ने सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं:
वोट बैंक का बिखराव
‘आप’ ने २०२२ में जिस दलित और ग्रामीण सिख वोट बैंक के भरोसे ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, उसमें भाजपा डेरा राजनीति और पंथिक कार्ड के जरिए बिखराव पैदा कर रही है।
पहचान और विमर्श की लड़ाई
‘आप’ मुख्य रूप से सुशासन, मुफ्त बिजली और शिक्षा-स्वास्थ्य के मॉडल पर राजनीति करती है। लेकिन भाजपा इसे ‘धार्मिक पहचान’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के विमर्श में खींच रही है, जिससे निपटना ‘आप’ के लिए वैचारिक रूप से कठिन हो रहा है।
स्थानीय स्तर पर लामबंदी
शहरी क्षेत्रों में जहां ‘आप’ की पकड़ ढीली हुई है, वहां भाजपा व्यापारी वर्ग और प्रवासियों को एकजुट कर स्थानीय निकाय चुनावों में ‘आप’ को कड़ी टक्कर दे रही है।
लुब्ब-ए-लबाब भाजपा पंजाब में केवल हिंदू मतों के भरोसे न रहकर डेरा समर्थकों, पंथिक सिखों और किसानों के बीच एक विश्वसनीय विकल्प बनने की तैयारी कर रही है। यदि ‘आप’ अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि और बुनियादी जन-मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं रख पाती, तो भाजपा का यह नया चक्रव्यूह उसके लिए आने वाले चुनावों में एक बड़ी मुसीबत बन सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और कृषि संकट
भाजपा ‘आप’ सरकार को प्रशासनिक मोर्चे पर विफल साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति, नशीली दवाओं की समस्या और सीमा पार से होने वाली ड्रोन गतिविधियों को लेकर भाजपा लगातार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा उठा रही है। साथ ही, किसान आंदोलनों के बाद पैदा हुए कृषि संकट, फसलों के दाम और मजदूरों की मजदूरी जैसे मुद्दों पर ‘आप’ सरकार की कथित नाकामियों को उजागर किया जा रहा है।
