मुख्यपृष्ठस्तंभयूनिफॉर्म को तरसते लाखों आदिवासी छात्र

यूनिफॉर्म को तरसते लाखों आदिवासी छात्र

मनमोहन सिंह

-अफसरशाही और ठेकेदारों का विशेष प्रेम

महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग से एक बेहद परेशान करने वाली खबर सामने आई है। प्रशासनिक अधिकारियों और बड़े ठेकेदारों के कथित गठजोड़ के कारण राज्य के करीब सवा दो लाख आदिवासी छात्र लगातार दूसरे वर्ष भी स्कूली यूनिफॉर्म से वंचित हैं। बच्चों के भविष्य और उनकी बुनियादी जरूरतों से ज्यादा तवज्जो ठेकेदारों के मुनाफे को दिए जाने के कारण यह गंभीर स्थिति पैदा हुई है।
क्या है पूरा मामला और तथ्य
महाराष्ट्र सरकार के आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत राज्य में ४९७ शासकीय आश्रमशालाएं संचालित की जाती हैं। नियमों के मुताबिक, इन आश्रमशालाओं में पढ़नेवाले सवा दो लाख छात्र-छात्राओं को हर साल शैक्षणिक सत्र के पहले ही दिन दो स्कूल यूनिफॉर्म, नाइट ड्रेस, कॉपियां, किताबें, स्कूल बैग और जूते जैसी आवश्यक वस्तुएं मिलना अनिवार्य है। लेकिन धरातल पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
अंध और दिव्यांग संस्था की अनदेखी
शैक्षणिक वर्ष २०२४-२५ में सरकार की सीधी दर-निर्धारण नीति के तहत सोलापुर स्थित अंध और दिव्यांगों के लिए काम करने वाली संस्था ‘जगदंबा रेडीमेड ड्रेसेस’ को करीब ११५ करोड़ रुपये के यूनिफॉर्म और नाइट ड्रेस की आपूर्ति का काम सौंपा गया था।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी
इस नई टेंडर प्रक्रिया को संस्था ने फिर से अदालत में चुनौती दी। अधिकारियों ने ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के चक्कर में न सिर्फ सरकारी आदेशों, बल्कि कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की भी अनदेखी की।
छात्रों पर क्या हो रहा है असर
यह कानूनी और प्रशासनिक खींचतान पिछले एक साल से अधिक समय से चल रही है। इसका खामियाजा उन गरीब और वंचित आदिवासी बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके पास पहनने के लिए ढंग के कपड़े तक नहीं हैं।
पिछले पूरे शैक्षणिक वर्ष में इन मासूम बच्चों को फटे-पुराने यूनिफॉर्म पहनकर ही स्कूल जाना पड़ा। अब नए सत्र में भी इसी लापरवाही की पुनरावृत्ति हो रही है। अधिकारियों और ठेकेदारों की साठगांठ के चलते लगातार दूसरे साल भी छात्र बिना यूनिफॉर्म के ही स्कूल जाने को मजबूर हैं।
हर साल इस विभाग की खरीदी में भ्रष्टाचार का ग्रहण लग जाता है। जनप्रतिनिधियों और मंत्रालयों के चक्कर काटते इन टेंडरों के बीच, उन सवा दो लाख आदिवासी बच्चों की सुध लेने वाला कोई नहीं है, जो शिक्षा के जरिए अपने जीवन को बेहतर बनाने का सपना देख रहे हैं।
अदालत के आदेश की अवहेलना
८ अगस्त २०२५ को हाई कोर्ट ने ठेकेदारों के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके बावजूद, आदिवासी विकास विभाग के अधिकारियों ने दिव्यांग संस्था का काम जारी रखने के बजाय नई टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी।
ठेकेदारों की लॉबी और अदालती लड़ाई
बड़े ठेकेदारों के एक समूह ने इस पैâसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि बिना टेंडर के किसी संस्था को १ करोड़ रुपये से अधिक का काम नहीं दिया जा सकता।

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