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संपादकीय : अफवाहों का चोर बाजार!

भारतीय जनता पार्टी अफवाहों का चोर बाजार है। इस बाजार से निकलने वाली अफवाहों की फसल ही उनका विकास है। `प्रधानमंत्री मोदी सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले नेता हैं’, ऐसी ही एक अफवाह उन्होंने आजकल बाजार में छोड़ी है। लेकिन अयोध्या के राम मंदिर से पांच करोड़ का गबन हुआ, यह कोई अफवाह नहीं बल्कि सच है, इस पर वे सब चुप हैं। अमेरिका के हमले में तीन भारतीय नाविक मारे गए, उसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने सीधा दुख तक व्यक्त नहीं किया; वे खुद फ्रांस के दौरे पर निकल गए और नाच-गाने में मग्न हो गए। उन नाविकों के शव ओमान के बंदरगाह पर सड़ रहे हैं। भारतीय नागरिकों के शवों की यह दुर्दशा चिंताजनक है। यह सब चलते हुए भी भाजपा ने दूसरे दलों के विधायकों-सांसदों को चुराने का अपना अभियान जारी रखा है। ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस को नामोनिशान के लिए भी बाकी नहीं छोड़ना है, ऐसा मोदी और शाह ने तय कर लिया है। उसी के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के विधायक और सांसद रोज टूट रहे हैं। अभिषेक बनर्जी के घर तड़के दो बजे पुलिस पहुंचती है और दरवाजे पर लात मारकर दहशत पैदा करती है। पुलिस द्वारा इतनी सुबह आकर इस तरह का आतंकवाद पैâलाने की क्या वजह है? इसे सत्ता का घमंड चढ़ना ही कहा जाएगा। ममता के सभी भरोसेमंद लोग एक पल में चले गए। अब तो सुदीप बंदोपाध्याय और देव अधिकारी जैसे भरोसेमंद लोग भी चले गए। तृणमूल कांग्रेस के ये सभी दलबदलू विधायक और सांसद अपने पद बचाने के लिए त्रिपुरा की एक दो कौड़ी की पार्टी में शामिल हो गए। इस विलय के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं रहा होगा। भाजपा ने इन लोगों को बेईमानी की दीक्षा दी है और जो सबसे बड़ा बेईमान होगा, उसे करोड़ों के पुरस्कार मिलेंगे। पश्चिम बंगाल में भाजपा के इस चोर बाजार में चार दिन पहले आग लग गई और उस आग में चार हजार
`ईवीएम’ जलकर खाक
हो गईं। इन ईवीएम का इस्तेमाल पश्चिम बंगाल के चुनाव में किया गया था। लेकिन जैसे ही ईवीएम में हेरफेर करके मतदान में गड़बड़ी करने के सबूत सामने आने लगे, वैसे ही सरकारी इमारत में आग लगाकर चार हजार ईवीएम जला दी गर्इं और सबूत ही नष्ट कर दिए गए। भारत देश की यह वर्तमान तस्वीर बेहद चिंताजनक है। मगर इस पर शर्मिंदा होने के बजाय सत्ताधारी लोग विपक्षी दलों को तोड़ने की अपनी ढिठाई रोकने को तैयार नहीं हैं। `तृणमूल तोड़ दी और अब हम फिर से शिवसेना तोड़ेंगे’, ऐसी शेखी बघारना भाजपा और उनके पिट्ठुओं (मिंधे) ने शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि यह `ऑपरेशन टाइगर’ है। महाराष्ट्र और देश में सियार-लोमड़ियों का राज चल रहा है और ये चले हैं `ऑपरेशन टाइगर’ करने! भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, दलबदल या किसी भी प्रकार के `टूट’ को मान्यता नहीं है। भले ही कोई दो-तिहाई संख्या बल के साथ टूटा हो, फिर भी लोकसभा या विधानसभा अध्यक्ष को इन बागियों को एक स्वतंत्र गुट के रूप में मान्यता देने का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय संविधान कहता है कि उन्हें किसी अन्य दल में विलय करके ही अपनी विधायकी या सांसदी बचानी होगी। लेकिन मोदी काल के लोकसभा और विधानसभा अध्यक्ष दसवीं अनुसूची की पुंगड़ी बनाकर उसे चूल्हे में झोंक रहे हैं। लोग दल बदल रहे हैं और अध्यक्ष के दरवाजे पर जाकर कह रहे हैं, `हम टूट गए हैं, हमें मान्यता दो’ और अध्यक्ष भी इस गैरकानूनी कृत्य में खुलेआम शामिल होते दिख रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट इन बेईमानों के रक्षक बनकर काम कर रहे हैं। वरना ऐसे मुकदमों के पैâसले चार-चार साल तक लटके न रहते। भारत के ८०-८५ न्यायाधीश महोदय लंदन जाकर भाजपा के मंत्रियों के साथ `पिकनिक’ मनाते हैं। उसमें रात की पार्टियां भी शामिल होंगी ही। ऐसी पार्टियों से
संविधान की क्या खाक रक्षा
होगी? दल बदलने वालों और टूटने वालों को निडर बनाने का काम ऐसे माहौल से ही होता है। तृणमूल टूट चुकी है। तृणमूल के सिंबल पर चुनाव जीतने वालों ने बेईमानी की है और यह सब सरकारी तामझाम के साथ चल रहा है। उधर दक्षिण कोरिया के स्थानीय चुनावों में सत्ताधारियों ने धांधली की, इस संदेह पर लाखों लोग चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर उतर आए; लेकिन यहां की जनता युद्ध की रोमांचक कहानियों के बजाय धार्मिक कहानियों के बगीचे में मस्त है और उन्हें लगता है कि मोदी द्वारा किए गए ये सारे तिकड़म कोई ईश्वरीय चमत्कार हैं। मोदी और उनके लोगों को देश में एक दलीय शासन थोपना है। लोकतंत्र का अंत करके, संविधान में बदलाव कर तानाशाही के रंग वाली अध्यक्षीय प्रणाली लानी है। राज्यों के क्षेत्रीय दलों को खत्म करके देश की संस्कृति को नष्ट करना है और इसकी शुरुआत हो चुकी है। यानी आगे चलकर चुनाव नहीं होंगे और राष्ट्राध्यक्ष ही अपना मंत्रिमंडल नियुक्त करेंगे; देश इसी शासन व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। महंगाई, पेपर लीक, बेरोजगारी, गिरता रुपया, महिलाओं पर अत्याचार इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री मुंह नहीं खोलते। विधायकों और सांसदों के दलबदल की खबरों ने हमारे देश के समाचार चैनलों और अखबारों की जगह घेर रखी है। चार हजार ईवीएम जलकर खाक हो गर्इं, इस पर समाचार चैनलों पर कोई बहस नहीं होती; लेकिन शिवसेना की बैठक में सांसद अनुपस्थित रहे, इसे राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया जाता है। तानाशाही शासन में दुनिया भर में ऐसा ही होता है। लोगों के बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए रोज नए बखेड़े खड़े करना और खुद का प्रधानमंत्री विदेश घूमने चले जाना। भारतीय संस्कृति और राजनीतिक व्यवस्था का ऐसा पतन चौंकाने वाला और खतरनाक है, लेकिन अफवाहों के चोर बाजार में `विकास’ धड़ल्ले से बिक रहा है।

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