दर्प का दंड!

अपनी भुजाएं उठाकर मानव ने
अम्बर को थाम लेना चाहा।
अपने कदमों से धरा को नाप डाला,
साहस की पतवार से
महासागरों को मथ डाला।

सच है, कुछ हद तक बन्दे, तूने
अपनी जीत सुनिश्चित कर दी।
क्षितिज पर अब तू सूर्य देव का रथ
रोकने की सोच रहा।

अमावस की रात गगन पर
मयंक की छवि टांक पाएगा।

धरातल पर जान गया है तू,
तेरा अपना साया भी साथ छोड़ जाता है कभी।

ब्रह्माण्ड की कोख में समाईं
करोड़ों आकाशगंगा देख अचंभित हुआ।

आंखों की सीमित क्षमता ने
तुझे अपनी विवशता का भान कराया।

असीमित ब्रह्माण्ड, अनगिनत सितारे,
कुछ अप्रकाशित, कुछ मरते तारे,
उड़ते-टकराते उल्कापिंड,
कई सितारों के अपने-अपने सूर्य।

तेरी ज्ञानेंद्रियां सन्न हो गईं।

सागर की गहराई से राज सामने आ रहे हैं।
अब और कब तक करेगा
अस्वीकार?

अपनी क्षुद्रता, वहशीपन।
तू तो ढूंढ रहा वह हथियार,
कैसे उजड़े दुश्मन देश की समृद्धि, व्यापार।
बसी-बसाई मानव बस्तियां, मचे हाहाकार।

काल की गति समझ से परे है तेरे।
जब काल का दंड इसके मुंड पर लगा,
सब काला-सफेद समझ आया।

तेरे कुछ कारनामों से
वसुधा का रुदन सामने आया।

युद्धों के अस्त्रों के प्रयोगों ने
मानव को रुलाया है।

दर्प का दंड सहना होगा,
अपनी मानसिकता का विश्लेषण करना होगा।

बेला विरदी

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