इन दिनों

फुर्सत कहां किसी को किसी के लिए यहां,
मस्त हैं सब अपने-अपनों में ही इन दिनों।
दौर आया कुछ ऐसा इस कलयुग का, देखो,
हर कोई है बेखबर, बेकदर सा इन दिनों।
रिश्ते भी अब बनते हैं सोच-समझ कर यूं,
कब, कहां, किससे क्या काम पड़ जाए इन दिनों।
चेहरों पर मुस्कान है, दिलों में हिसाब छुपा,
हर बात में मतलब का असर है इन दिनों।
चंद लम्हों की चाहत, और सालों की दूरी,
रिश्तों का भी अजीब सफर है इन दिनों।
मुनीष भाटिया / मोहाली

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