मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: तेल, ट्रंप और हॉर्मुज की आग में जलती दुनिया

रुख-ए-सियासत: तेल, ट्रंप और हॉर्मुज की आग में जलती दुनिया

तौसीफ कुरैशी

हॉर्मुज की खाड़ी में इस समय सिर्फ जहाज नहीं चल रहे, इतिहास भी करवट ले रहा है। तेल के टैंकरों के बीच से गुजरती हवाएं बता रही हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें भी कभी-कभी अपने ही बनाए जाल में फंस जाती हैं। कहते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले बातचीत होती है। लेकिन आजकल बातचीत भी युद्ध का ही एक मोर्चा बन गई है। खबरें आती हैं कि फोन हुए, संदेश गए, मध्यस्थ दौड़े और समझौतों के मसौदे बने। फिर कुछ घंटों बाद पता चलता है कि जिसे शांति का रास्ता बताया जा रहा था, वह दरअसल ताकत की रस्साकशी का नया अध्याय था। अमेरिका की मुश्किल यह है कि वह दुनिया को अपनी शर्तों पर चलाने का आदी रहा है। मगर ईरान उन देशों में है जो अपनी शर्तों पर खड़े रहने का आदी है या उसे रूस और चीन ने कर दिया है। जब दो जिद्दी आमने-सामने होते हैं तो समझौते की मेज भी रणभूमि जैसी दिखाई देने लगती है। इस पूरे खेल के केंद्र में सिर्फ राजनीति नहीं है, तेल भी है। तेल सिर्फ ईंधन नहीं, आधुनिक साम्राज्यों की नसों में दौड़ता हुआ रक्त है। उसके दाम बढ़ते हैं तो सरकारें कांपती हैं, बाजार डगमगाते हैं और आम आदमी की जेब हल्की हो जाती है। इसलिए हॉर्मुज की खाड़ी में उठी हर लहर दिल्ली, बीजिंग, लंदन और वॉशिंगटन तक महसूस की जाती है। भारत की चिंता अलग है। लाखों भारतीय समुद्री उद्योग से जुड़े हैं। वे जहाज चलाते हैं, इंजन संभालते हैं, समुद्र की अनिश्चितताओं से लड़ते हैं। उन्हें न तेल की राजनीति से मतलब होता है और न महाशक्तियों की रणनीति से। लेकिन जब युद्ध के बादल घिरते हैं तो सबसे पहले उनकी सुरक्षा दांव पर लगती है। दुनिया के बड़े नेता अक्सर युद्ध को शतरंज समझते हैं। वे मोहरे आगे बढ़ाते हैं, चालें चलते हैं और जीत-हार के हिसाब लगाते हैं। मगर शतरंज और जिंदगी में फर्क होता है। शतरंज में मोहरे लकड़ी के होते हैं, जिंदगी में वे इंसान होते हैं। आज सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा। सवाल यह है कि अगर हॉर्मुज की आग और भड़की तो उसकी लपटें कहां तक जाएंगी। इतिहास गवाह है कि तेल के कुओं से निकली आग कई बार साम्राज्यों की नींव तक पहुंच जाती है। शायद यही वह क्षण है जब दुनिया को ताकत के प्रदर्शन से ज्यादा विवेक की जरूरत है। क्योंकि युद्ध शुरू करना आसान है, लेकिन उसकी राख से भविष्य बनाना बहुत कठिन। हां, एक बात तो साफ हो गई है कि संघियों के फादरलैंड की लंका लगनी तय है। सत्यमेव जयते।

जब लोकतंत्र के दरवाजे बंद हो जाएं

-लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं रहता, वह जनता के भरोसे में रहता है। जिस दिन जनता का भरोसा टूटने लगे, उसी दिन लोकतंत्र की नींव में दरार पड़ जाती है। आज वही दरार दिखाई दे रही है।

लोकतंत्र की हत्या हमेशा टैंकों और बंदूकों से नहीं होती। कई बार वह फाइलों, तारीखों और बंद दरवाजों के पीछे भी कर दी जाती है। और सबसे बड़ा दुख यह है कि उसके सारे सबूत मौजूद होते हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं होता। बिना कारण मध्यप्रदेश में मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन रद्द करने के मामले ने यही सवाल फिर खड़ा कर दिया है। एक निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकारों, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा मामला सामने आया। लेकिन जिस दिन सवाल उठे, उसी दिन चुनाव आयोग मिलने को तैयार नहीं था। जिस दिन न्याय की गुहार लगाई गई, उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी। और जब संविधान के सर्वोच्च पद की ओर देखा गया, तब राष्ट्रपति भवन के दरवाजे भी बंद मिले। लगता है सब कुछ पूर्वत तय किया गया था अब सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। सवाल यह है कि यदि नागरिक, जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल अपनी शिकायत लेकर जाएं तो जाएं कहां? लोकतंत्र की पूरी इमारत इसी भरोसे पर खड़ी होती है कि अंतत: कहीं न कहीं कोई दरवाजा खुला होगा, कोई संस्था सुनेगी, कोई मंच न्याय देगा। लेकिन जब हर दरवाजा एक साथ बंद दिखाई देने लगे, तब लोकतंत्र का नागरिक अपने को अनाथ महसूस करने लगता है। लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं रहता, वह जनता के भरोसे में रहता है। जिस दिन जनता का भरोसा टूटने लगे, उसी दिन लोकतंत्र की नींव में दरार पड़ जाती है। आज वही दरार दिखाई दे रही है। संस्थाएं मौजूद हैं, भवन खड़े हैं, पदाधिकारी बैठे हैं, लेकिन जनता के मन में यह प्रश्न गहराता जा रहा है कि क्या उसकी आवाज सचमुच कहीं पहुंच भी रही है? विडंबना देखिए कि सबूत भी हैं, दस्तावेज भी हैं, आरोप भी हैं और सवाल भी। मगर जवाब कहीं नहीं है। सत्ता कहती है सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ। विपक्ष कहता है लोकतंत्र का गला घोंटा गया। लेकिन सच्चाई का पैâसला कौन करेगा, जब सुनवाई करने वाले ही उपलब्ध न हों?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएं होती हैं। लेकिन संस्थाएं केवल भवन और पद नहीं होतीं, वे जनता के विश्वास से चलती हैं। यदि नागरिक को यह लगने लगे कि उसकी पुकार किसी तक नहीं पहुंच रही, तो यह किसी एक नेता या दल की नहीं, पूरे लोकतंत्र की हार है। और शायद आज सबसे बड़ा सवाल यही है अगर चुनाव आयोग न सुने, अदालत उस दिन न बैठे और राष्ट्रपति मिलने से मना कर दे, तो लोकतंत्र का नागरिक आखिर किस दरवाजे पर दस्तक दे? यही प्रश्न हमारे समय की सबसे भयावह गूंज बनता जा रहा है। सत्यमेव जयते

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