राजन पारकर
लोकतंत्र का रंगमंच भी कितना अद्भुत है! यहां कभी संगठन के अस्तित्व का प्रमाण मांगा जाता है, कभी आंदोलन की जगह को पवित्र करने का अभियान चलता है और कभी जनता के सवालों से बड़ी नेताओं की आपसी कुर्सी की लड़ाई बन जाती है।
एक तरफ सवाल है- ‘कौन रजिस्टर है, कौन नहीं?’
दूसरी तरफ सवाल है- ‘किसकी जमीन पवित्र है और किसकी राजनीति?’
तीसरी तरफ सवाल है- ‘जनता के लिए लड़ाई है या गुटों की मलाई?’
देश की राजनीति में अब मुद्दे कम और प्रतीक ज्यादा हो गए हैं। कहीं कागजों की खोज है, कहीं गोमूत्र की धार है तो कहीं पार्टी कार्यालय में ही गुटबाजी की तलवार है।
‘रजिस्टर की राजनीति- धर्म भी कागज पर नहीं, फिर सवाल सिर्फ संघ से क्यों?’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीकरण को लेकर उठे सवालों पर मोहन भागवत ने जवाब दिया कि हर चीज का रजिस्टर में नाम होना जरूरी नहीं, यहां तक कि हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।
राजनीति का नया नियम
जिसका रजिस्ट्रेशन नहीं, उसका अस्तित्व संदिग्ध! फिर तो हवा, पानी, आस्था और विचारों को भी कल से सरकारी फाइल में आवेदन देना पड़ेगा कि ‘हम मौजूद हैं।’ देश में सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सवालों की दुकान भी अजीब है- कभी प्रमाण मांगा जाता है, कभी प्रमाण देनेवाले से ही प्रमाण मांगा जाता है। अगर हर विचारधारा को मुहर की जरूरत पड़ने लगे तो इतिहास की आधी किताबें और समाज की पूरी भावना ‘अनरजिस्टर्ड’ घोषित हो जाएगी। राजनीति में असली परीक्षा कागज की नहीं, जनता के विश्वास की होती है। …‘आंदोलन के बाद शुद्धीकरण- मुद्दे हार गए, प्रतीक जीत गए!’ शेतकरी कर्जमाफी के लिए रोहित पवार के आंदोलन स्थल पर गोमूत्र छिड़ककर शुद्धीकरण करने की घटना ने नया राजनीतिक अध्याय खोल दिया।
वाह रे राजनीति!
जहां किसान की जमीन सूख रही है, वहां बहस अब इस बात पर आ गई कि आंदोलन की जमीन कितनी पवित्र थी! किसान की जेब खाली है, लेकिन राजनीति के पास हर विवाद के लिए नया ‘सफाई अभियान’ तैयार है।
कल तक सवाल था- किसान को कर्ज से मुक्ति कब मिलेगी?
आज सवाल बन गया- धरनास्थल की शुद्धि किससे होगी?
कभी-कभी लगता है कि असली बीमारी समस्या नहीं, बल्कि समस्या पर होनेवाली राजनीति है।
किसान की आंखों के आंसू पोंछने से ज्यादा आसान है मंच पर प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ना।
…‘कांग्रेस का घर ही अखाड़ा- विरोधी बाहर नहीं, अंदर तैयार!’
महाराष्ट्र कांग्रेस में गुटबाजी की खबरों के बीच चंद्रपुर महानगरपालिका में अंदरूनी खींचतान की चर्चा तेज है।
सियासत का सबसे पुराना खेल
दुश्मन बाहर ढूंढने से पहले घर के अंदर कुर्सियां गिन लो!
जनता ने प्रतिनिधि चुने, लेकिन नेता अपने-अपने खेमे गिनने लगे। कांग्रेस की हालत ऐसी हो गई है कि चुनाव जीतने के बाद भी जश्न कम और ‘मेरा गुट, तेरा गुट’ की बैठक ज्यादा दिखाई देती है।
राजनीति में हार का इलाज आत्मचिंतन होता है, लेकिन कई पार्टियों ने उसका विकल्प खोज लिया है- आपस में ही लड़ते रहो। जब घर का दरवाजा ही आपस में खुला हो तो बाहर की हवा को दोष देना आसान हो जाता है।
आज की राजनीति का चित्र बड़ा विचित्र है-
कहीं पहचान का प्रमाण मांगा जा रहा है,
कहीं पवित्रता का प्रमाण दिया जा रहा है,
और कहीं नेतृत्व का प्रमाण खोजा जा रहा है।
जनता पूछ रही है –
‘साहब, हमारे रोजगार, महंगाई, किसान और भविष्य का रजिस्टर कब खुलेगा?’
क्योंकि लोकतंत्र की असली फाइल में न कोई गुट होता है, न कोई तमाशा- उसमें सिर्फ जनता का हिसाब लिखा होता है।
