मुख्यपृष्ठस्तंभकांव-कांव : संपादक जी का पेलमिट कैसे गिरा?

कांव-कांव : संपादक जी का पेलमिट कैसे गिरा?

हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्या! संपादक जी का पेलमिट गया! कब और वैâसे हुआ यह अनर्थ
उपसंपादक को कोई जवाब मिल पाता, उससे पहले असिस्टेंट एडिटर का फोन डिसकनेक्ट हो गया।
अव्वल तो सबएडिटर समझ ही नहीं पाया कि पेलमिट होता क्या है। उसने जीवन में पहली बार पेलमिट का नाम सुना था तो उसे लगा कि यह कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज होगी। असिस्टेंट एडिटर ने फोन करके ऑफिस को भी बता दिया।
यह खबर ब्रेकिंग न्यूज थी। जंगल की आग की तरह सन्न से पूरे शहर में पैâल गई। लोग जहां थे, जैसे थे, सब काम छोड़कर संपादक जी के घर की ओर भागे। शोक-संवेदना व्यक्त करने की शहर में होड़ मच गई। लोग सबसे पहले शोक-संवेदना व्यक्त करके संपादक जी की कृपादृष्टि पाना चाहते थे।
नेता जी भी उनके घर जा रहे थे। उनकी खबर अखबार में छपती रहे, सो जाना जरूरी था। जो लोग राजनीति में सक्रिय नहीं थे। वे भी उनके घर जा रहे थे। एक तरह से शहर ही उमड़ पड़ा था।
संपादक जी की अनुपस्थिति में असिस्टेंट एडिटर ने मीटिंग की अध्यक्षता की। पैâसला बना कि संपादक जी का पेलमिट गिरा है, तो अखबार एक दिन नहीं छपना चाहिए। बस काम बंद। सभी कर्मचारी संपादक जी के घर चल दिए। सब शोक में शरीक होनेवाले थे।
कुछ कर्मचारी स्वेच्छा से जा रहे थे। कुछ मजबूरी में। जो मजबूरी में जा रहे थे, डर भी रहे थे कि संपादक को पता चल गया कि नहीं आया तो अप्रेजल रोक देगा। आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसलिए जाना जरूरी है। वहां चेहरा दिखा कर निकल लेंगे। इसलिए चले जा रहे थे।
संपादक जी चौराहे पर ट्रैफिक जाम था। इतने लोग आ रहे थे, ट्रैफिक संभाल नहीं पाया। यही हाल संपादक के घर का था। भीड़ जमा हो गई। कई लोग तो बैनर बनवा कर लाए थे। बैनर पर लिखा था, संपादक जी का पेलमिट अमर रहे।
संपादक जी के घर में प्रवेश करना अभेद्य किले में सेंध लगाने जैसा था। हॉल में पेलमिट पड़ा था। परदा नीचे दबा था। जैसे गिरा था वैसे ही था। ताकि पुलिस को सबूत एकत्रित करने में कोई असुविधा न हो। दृश्य बहुत कारुणिक था। संपादक जी सोफे पर थे। एकदम मौन। गाल पर हाथ धरे। लोग आ-जा रहे थे। आगंतुक वहां पहुंचकर अभिवादन करते थे। फिर बैठ जाते। संपादक जी अभिवादन का जवाब नहीं दे रहे थे। लोग कुछ देर बैठते। जब इत्मीनान हो जाता कि संपादक जी ने विधिवत देख लिया है तो फिर अभिवादन करते और निकल लेते।
बेडरूम की ओर जानेवाली जगह पर एक शेल्फ था। उस पर फोन रखा था। उनका लड़का फोन के पास खड़ा था। फोन की घंटी बराबर बज रही थी। अचानक घंटी फिर बजी। लड़के ने रिसीवर उठा लिया।
हां सही खबर है।
-आज सुबह ही गिरा।
-कारण का पता नहीं चल पाया है।
-ठीक है।
उसने फोन क्रेंडिल पर रख दिया। फोन रखते ही फिर घंटी बजी। बेटे ने फिर फोन उठाया।
-हां यह संपादक जी का ही नंबर है। मैं उनका बेटा बोल रहा हूं।
-हां, आज सुबह गिर गया।
-पता नहीं। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है।
-हां, बात करवाता हूं। पापा सीएम साहब का फोन है।
सीएम साहब का नाम चुनते ही संपादक जी बिजली की सी फ़ुर्ती से उठे और बेटे के हाथ से रिसीवर लगभग छीन लिया।
-नमस्कार सर, हां, यह घटना आज प्रात:काल हुई।
-नहीं, कोई जान-माल की हानि नहीं हुई। हां…
संपादक जी बहुत धीरे-धीरे बोल रहे थे। उन्होंने फोन रख दिया। वापस आकर अपनी जगह बैठ गए। फोन की घंटी फिर बज गई। बेटे ने फोन उठाया।
-हां बात करवाता हूं। पापा, पीएमओ से फोन है। प्रधानमंत्री जी बात करना चाहते हैं।
संपादक जी इस बार पहले से भी ज्यादा तेजी से उठे और रिसीवर लगभग झटक लिया।
-हां सर… जी सर, आज सुबह ही हुआ यह हादसा। नहीं कोई घायल नहीं हुआ। हम लोग सो रहे थे। गिरने की आवाज सुने तो हॉल में आए, लेकिन तब तक पेलमिट गिर चुका था।
-जी जी जी… हां अब होनी को कौन टाल सकता है।
तभी गृहमंत्री जी पहुंच गए। पेलमिट के पास गए। उसे गौर से देखने लगे। सामने फर्श पर सागवान का पेलमिट अपनी पूरी नग्नता के साथ पड़ा था। पेलमिट के गिरते ही खिड़की के पीछे छिपी बरसों की धूल, मकड़ी के जाले और दीवारों की उखड़ी हुई पपड़ी साफ दिखने लगी थी। संपादक जी युद्ध में पराजित योद्धा की तरह लग रहे थे। वह चकाचौंध, जो संपादक जी के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द बुनी गई थी, उस उखड़े हुए पेलमिट के साथ धराशायी हो गई थी। मंत्री जी ने पेलमिट को छूकर ऐसे आह भरी, जैसे उन्होंने देश का संविधान गिरते देख लिया हो। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, -संपादक जी, पेलमिट नहीं गिरा है, यह तो व्यवस्था पर चोट है! मैं अभी पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर को सस्पेंड करवाने का लेटर लिखता हूं।
-जाने दीजिए मंत्री जी। संपादक जी बोले, -इस दुख को मुझे ही सहने दीजिए। किसी को दोष नहीं, मेरे भाग्य का दोष है। किसी को सस्पेंड मत करवाइए।
मंत्री जी चले गए। असिस्टेंट एडिटर आ गए।
-अखबार का प्रकाशन आज नहीं होगा सर।
-क्यों…
-अरे… पेलमिट गिर गया है तो…
-नहीं। अखबार छपना चाहिए। कर्म नहीं रुकना चाहिए। हमें कर्म करते जाना है। कहकर संपादक जी फिर से गमगीन मुद्रा में आ गए। पेलमिट को देखने लगे।

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