एड. राजीव मिश्र / मुंबई
सुबह हरिया जइसय गोरुन के सानी-पानी कइ के खाली भएं ओइसय अपनी मेहरिया के आवाज दिहें, अरे सुनत हउ! गोलुआ के माई… अरे कहां गयु। इतना सुनतय अंदर से हरहरात की हरियाबौ निकरी। का है? एक्कउ मिनट न चैन से बइठत हौ, न बइठय देत हौ। अब चलो बताओ का भवा? काहे मुंह के मुजफ्फरपुर करे बइठे हौ? अरे सुबह से काम मा लागि हैं, न कउनउ चाय-पानी, न कउनउ खरमेटाव, आखिर घर मा चलि का रहा है? खाली पेट कब तक काम होइ? अइसा है हरिया के बाबू! तुमका का लागत है, एक तुमहीं काम करत हौ बाकी सब बइठ के खटिया तोरत हैं। एक सुबह से जब से जागि हैं कमर टेकय भर के फुरसत नही मिली है, ओहिपे तुम्हार ई नौटंकी। हरिया झल्लाई के बोलि परे, अरे हम तो बस खरमेटाव मांगे अही, ओहिपे तुम्हार इतना बड़ा भाषण। अइसा है अगर तुम्हरे पास चाय नाश्ता देवय भरे के टाइम नही हव तो हमरे पास कउनउ जरूरत के समय कुछौ मांगबौ मत किहू। ओहोहोहोहो… अब लौ बियहि तो तुम लायो तो मांगय के लिए पड़ोसी के पास जाई? अरे तो तुम्हारौ कउनउ धरम अहइ कि नही। मनसेधू खाली पेट खटि रहा है दुइ ठो रोटी नही बनि पावत है तुमसे अउर बकलोली दुनिया भर के कराय लेव। अइसा है गोलू के बप्पा, हमरे बाप अउर भाय मुंह झउसय लायक रहें, नाही तो अच्छा खासा इंजीनियर लड़िका मिलत रहा, ओहिके साथे बियाह भवा होत तो अब तक घर मा नौकर-चाकर लागि होते, पर उनके बुद्धि पर काठि परा रहा जवन तुम्हरे साथ बियाहि दिहिन। अब किस्मत में गोबर पाथय के लिखा रहा तो राज अरे तो उही के पास चली जाओ, इहां का कइ रही हौ। जब दुइ टैम के रोटी नही मिलि पावत है तो यहि मेहरारू के रहे कउन फायदा है। हां-हां…तुम तो चहतै हौ बस कउनउ तरह पिंड छूटै और तू केहू अउर के साथ गुलछर्रा उड़ाओ। पर ई तो हम होयही नही देब। तुमका दुइ टैम नही तीन टैम खियायिब पर तुम्हारी जान नही छोडब। इतना सुनतै हरिया के हंसी छुटि गय। ज्यादा खींस न काढ़ो लेइ आईथऽ खरमेटाव, इतना कहिके हरियाबौ भुनभुनात रसोई की ओर निकरि गई।
