कुवंर मलिक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समय से पूर्व चुनाव आने से पहले ही सीटों का गणित शुरू हो गया है। २०२७ विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं, इसलिए विपक्षी खेमे में शक्ति-संतुलन की लड़ाई शुरू होती दिखाई देने लगी है। पश्चिम यूपी की सहारनपुर लोकसभा से कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद का यह बयान कि ‘सत्ताधारी भाजपा को हराने के लिए अखिलेश यादव को राहुल गांधी का हाथ थामना ही होगा, यह उनकी मजबूरी है’, केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह टीएमसी के हस्र होने के बाद विपक्षी राजनीति के भीतर चल रहे नेतृत्व संघर्ष का सार्वजनिक संकेत भी है। यदि वास्तव में कांग्रेस ने प्रदेश की १७० विधानसभा सीटों को चिह््िनत कर रखा है और गठबंधन में अपने लिए बड़ी हिस्सेदारी चाहती है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस अपनी वास्तविक ताकत के आधार पर बात कर रही है या फिर भविष्य की संभावनाओं के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी कर रही है?
कांग्रेस का बदला हुआ आत्मविश्वास
ज़ाहिर है कि २०१७ और २०२२ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। २०२२ में पार्टी मात्र दो सीटें जीत पाई थी, लेकिन २०२४ लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं। कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया और उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करने का प्रयास किया। इसी को सफलता मानते हुए कांग्रेस नेतृत्व में आत्मविश्वास पैदा हुआ लगता है। पार्टी अब केवल गठबंधन की ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका में नहीं रहना चाहती। राहुल गांधी की सक्रियता, संविधान और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर विपक्षी राजनीति का नया नैरेटिव और भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण ने कांग्रेस को यह विश्वास दिला दिया है कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन पर फिर से सियासी फसल तैयार कर सकती है। लेकिन सियासत सिर्फ आत्मविश्वास से नहीं चलती, बल्कि उसके लिए संगठन, बूथ स्तर की ताकत और स्थानीय नेतृत्व भी चाहिए होता है। यही वह क्षेत्र है जहां समाजवादी पार्टी आज भी कांग्रेस से कहीं आगे दिखाई देती है।
अखिलेश यादव की असली दुविधा
समाजवादी पार्टी आज उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुकाबले सबसे बड़ी विपक्षी ताकत है। २०२४ लोकसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया और यह साबित किया कि उसका सामाजिक गठबंधन अभी भी प्रभावी है। ऐसी स्थिति में अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी एकता बनाए रखना। दूसरी, अपनी राजनीतिक जमीन को कांग्रेस के पक्ष में अत्यधिक कमजोर होने से बचाना। यदि कांग्रेस वास्तव में १७० सीटों जैसी बड़ी मांग रखती है, तो यह सपा के लिए स्वीकार करना आसान नहीं होगा। ४०३ सदस्यीय विधानसभा में १७० सीटें लगभग ४२ प्रतिशत हिस्सेदारी बनती हैं। जिस राज्य में सपा का संगठन कांग्रेस की तुलना में कई गुना मजबूत है, वहां इतनी बड़ी हिस्सेदारी देना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम होगा। इसलिए सीटों का बंटवारा केवल भाजपा विरोधी एकता का प्रश्न नहीं होगा, बल्कि विपक्षी नेतृत्व के प्रश्न से भी जुड़ा होगा।
क्या राहुल बनाम मोदी की राजनीति में अखिलेश के लिए जगह है?
कांग्रेसी सांसद इमरान मसूद का यह कहना कि देश में केवल दो धाराएं हैं, राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी, राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति राष्ट्रीय राजनीति से अलग भी चलती है। यहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अखिलेश यादव केवल एक सहयोगी दल के नेता नहीं हैं। वे उत्तर प्रदेश में एक स्वतंत्र राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए यह मान लेना कि वे केवल कांग्रेस के पीछे खड़े होकर राजनीति करेंगे, शायद वास्तविकता से दूर होगा। सपा चाहे गठबंधन करे, लेकिन वह अपने राजनीतिक अस्तित्व और नेतृत्व की कीमत पर ऐसा नहीं करेगी।
ओवैसी और चंद्रशेखर का बढ़ता महत्व
२०२७ के समीकरण में एक और दिलचस्प पहलू है। असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं की भूमिका। मुस्लिम और दलित वोटों के बीच प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे ये दोनों नेता विपक्षी वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं।
यदि कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर तनाव बढ़ता है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ भाजपा को मिल सकता है। विपक्षी वोटों का बिखराव भाजपा की चुनावी रणनीति को मजबूत करेगा।
दूसरी ओर, कांग्रेस यदि ओवैसी या चंद्रशेखर जैसे नेताओं के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राजनीतिक समझ बनाने की कोशिश करती है, तो इससे सपा की चिंता और बढ़ सकती है। हालांकि, अभी तक ऐसे किसी औपचारिक समीकरण के ठोस संकेत नहीं हैं, लेकिन राजनीति में संभावनाएं ही अक्सर दबाव बनाने का सबसे प्रभावी हथियार होती हैं।
सीटों की लड़ाई या नेतृत्व की लड़ाई?
दरअसल, असली स्ावाल १७० सीटों का नहीं है, बल्कि असल सवाल यह है कि २०२७ में उत्तर प्रदेश में विपक्ष का चेहरा कौन होगा? बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व के आधार पर बड़ी हिस्सेदारी चाहती है? या फिर सपा अपने हालिया चुनावी प्रदर्शन के आधार पर गठबंधन में प्रमुख भूमिका बनाए रखना चाहती है? यही संघर्ष आने वाले महीनों में और स्पष्ट होगा।
बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों एक-दूसरे की जरूरत भी हैं और चुनौती भी। भाजपा जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी का मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकता आवश्यक है, लेकिन सीटों का बंटवारा केवल गणित नहीं, बल्कि सम्मान और नेतृत्व का प्रश्न भी होता है। कांग्रेस की कथित १७० सीटों की मांग एक राजनीतिक संदेश है कि वह अब हाशिये पर रहने को तैयार नहीं है। वहीं अखिलेश यादव के लिए यह संदेश है कि गठबंधन में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद वे सहयोगियों की आकांक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते। २०२७ की लड़ाई केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं होगी। यह विपक्ष के भीतर नेतृत्व, प्रभाव और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई भी होगी। और संभव है कि इस लड़ाई का पहला रणक्षेत्र सीटों का बंटवारा ही बने। बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपनी महत्वाकांक्षा को वोटों में बदल पाएगी या फिर सीटों की यह ऊंची मांग विपक्षी एकता के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर देगी?
