कविता श्रीवास्तव
जून का आधा महीना बीत चुका है, लेकिन राज्य में मानसून की वह पहली ‘भरोसे की फुहार’ अब तक लोगों के चेहरे पर राहत बनकर नहीं उतरी है। आसमान अब भी चुप्पी साधे बैठा है। कभी-कभी बादल उमड़-घुमड़ तो रहे हैं, लेकिन बूंदें बरस नहीं रहीं। अब पूरे राज्य में इंतजार के साथ चिंता भी बढ़ रही है। शहरी इलाकों में जलापूर्ति पर नियंत्रण शुरू हो चुका है। कई जगह पानी की कटौती लागू हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पानी की कमी महसूस की जा रही है। वहां बांधों से पानी छोड़ने पर रोक लगी है। नगरपालिकाएं और जल आपूर्ति विभाग कोशिश में है कि आने वाले समय में स्थिति और गंभीर न हो जाए। कई जगहों पर अनावश्यक जल उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है। अब खेती-किसानी पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जिन खेतों में इस समय हरियाली पैâल जानी चाहिए थी, वहां जमीन में दरारें उभरने लगी हैं। बोई गई फसलें पानी की कमी से प्रभावित हो रही हैं। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। कई ग्रामीण इलाकों से पशुओं के चारे और पीने के पानी की कमी की चिंताजनक खबरें भी सामने आ रही हैं। इधर मुंबई जैसे महानगर में भी जल संकट धीरे-धीरे लोगों की दिनचर्या को प्रभावित कर रहा है। पानी की कटौती का असर अब घरों की रसोई से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक महसूस किया जा रहा है। प्रशासन की ओर से पानी बचाने की अपीलें लगातार तेज हो रही हैं। नागरिकों से नहाने, कपड़े धोने और घरेलू उपयोग में पानी का अत्यंत सीमित उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। इस बार बारिश कम होगी, यह अनुमान तो था ही।। इसके पीछे समुद्री हवाओं और वायुमंडलीय दबाव में असंतुलन प्रमुख कारण है। इस साल ‘अल नीनो’ का असर भी है। इससे बारिश का पैटर्न प्रभावित हुआ है। हालांकि, आने वाले दिनों में स्थिति बदल भी सकती है। इसी बीच बरसात की कमी और आपूर्ति बाधित होने के कारण मुंबई में फल और सब्जियों के दामों में बढ़ोतरी हुई है। आवक प्रभावित होने से बाजार में आपूर्ति कम हो गई है, जिससे सब्जियों और फलों की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। इसका सीधा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है, जिनके लिए रोजमर्रा की खरीदारी पहले से ज्यादा महंगी हो गई है। अब जरूरत इस बात की है कि पानी के संरक्षण को सिर्फ सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामूहिक जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए। चाहे घर हो, खेत हो या उद्योग हर स्तर पर पानी के उपयोग में संयम ही सबसे बड़ा समाधान बन सकता है। प्रशासन ही नहीं नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। हम जल बचाने के संदेश हर जगह देखते, सुनते और पढ़ते हैं। उन्हें दैनंदिन जीवन में अपनाना भी चाहिए, तभी तो पानी बचाने में हमारा भी योगदान होगा। लेकिन सबसे बड़ी उम्मीद अब भी आसमान पर ही है।
