संजय राऊत
भारत की राजनीति में फिलहाल बेईमानी का तांडव मचा हुआ है। पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक नामचीन बेईमान मीर जाफर, जयचंद, ब्रूटस की फसल प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में भरपूर निकल रही है। मोदी के प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल को १२ साल हो गए। इस काल में मोदी का योगदान क्या है? तो उन्होंने आयाराम-गयाराम संस्कृति को फिर से प्रतिष्ठा दिला दी। महाराष्ट्र में शिवसेना के छह सांसद टूटने की जोरदार हवा बनी। खबरें जोर-शोर से आर्इं, वे झूठी नहीं होंगी। क्योंकि कई सांसदों ने संपर्क तोड़ दिया और गायब हो गए। एकनाथ शिंदे ने इन सभी सांसदों के जिलों में चार्टर विमान भेजकर उन्हें दिल्ली बुलाया और उससे पहले पंद्रह करोड़ की बिदागी (पारिश्रमिक) घर पहुंचा दी। आखिरकार ये सब लोग खुद को बाजार में बेचने के लिए खड़े हो गए। उनकी बोली लग गई। महाराष्ट्र में ऐसे मामले बार-बार होने लगे हैं और उन्हें राजनीतिक मान्यता मिल गई है। एक पार्टी के चिह्न पर चुनकर आना और तुरंत दूसरी पार्टी में ‘बिक’ जाना। फिर निर्वाचन क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए पाला बदला, ऐसा कहना। गायब हुए एक सांसद मिले। उनका और मेरा संवाद एक राजनीतिक दस्तावेज बनना चाहिए!
वे सांसद समय लेकर दिल्ली में मिलने आए।
‘‘साहब, थोड़ी बात करनी थी…!”
‘‘बोलो…”
‘‘कैसे होगा? काम करना मुश्किल हो गया है…”
‘‘क्यों? क्या हुआ?”
‘‘विकास का फंड ही नहीं मिलता। निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। उन्हें फंड चाहिए। जरा सरकार से तालमेल बिठाइए।”
‘‘सरकार से तालमेल कैसे बिठाएं? आपके पास तालमेल बिठाने का कोई फॉर्मूला है क्या?’’ मैंने कहा।
‘‘सरकार से तालमेल बिठाइए… साहब।”
‘‘अरे भाई, साफ बोलो। तुम्हें तंबू बदलना है। एक बात याद रखो, तुम राजनीति से पूरी तरह बाहर हो चुके थे। पार्टी ने तुम्हें टिकट दिया, चुनाव का खर्च दिया, कार्यकर्ताओं ने खून-पसीना एक किया। उद्धव ठाकरे ने प्रचार किया। तब तुम सांसद बने। तुम्हें भाजपा और शिंदे के खिलाफ वोट मिला। विपक्ष में शिवसेना है, यह तब तुम्हें पता था न? सरकार से फंड नहीं मिलेगा और संघर्ष करना पड़ेगा, यह भी पता था। अब सांसद बन गए। भाव बढ़ गया और पाला बदल रहे हो?”
‘‘विकास कार्यों के लिए…”
‘‘…अरे, अभी तक प्रधानमंत्री मोदी के वाराणसी में विकास नहीं हुआ। तुम किस विकास की बात कर रहे हो? यह सिर्फ बहाना है। लोग कहते हैं तुमने शिंदे गुट से पंद्रह करोड़ लिए। इसे किस तरह का विकास फंड कहें?’’ इस पर वे सांसद महोदय तुरंत निकल गए।
ठेकेदार सांसद
महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों में सभी विधायकों-सांसदों को एक तरह से ‘ठेकेदार’ बना दिया गया। अमीरी का नया रास्ता बन गया। शिंदे गुट में गए सभी सांसदों को २००-४०० करोड़ की विकास निधि यानी ठेकेदारी के काम मिलते हैं। उसमें से २० फीसदी कमीशन तुरंत मिल जाता है और इससे देश का, निर्वाचन क्षेत्र का विकास होता है। ऐसा यह धंधा चल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के बीस सांसद टूट गए। उनमें से छह लोगों को प्रति व्यक्ति पांच करोड़ दिए गए और बाकियों को अगले तीन साल तक हर महीने ५० लाख जेब खर्च के लिए देने का करार हुआ। इन सांसदों ने टूटने के लिए इस तरह का मासिक वेतन स्वीकार किया। उन्हें हर महीने करोड़ों रुपए पश्चिम बंगाल की सरकार किस रास्ते से देने वाली है? ममता बनर्जी के काल में भ्रष्टाचार फैला है, ऐसा कहने वाले भाजपा के लोग तृणमूल के भ्रष्ट नेताओं को हर महीने वेतन देकर पालने वाले हैं। आयाराम-गयाराम और भ्रष्टाचारियों को इतनी प्रतिष्ठा इससे पहले किसी भी शासन में नहीं मिली थी। भारत में राजनीतिक नैतिकता का पूरा पतन अब हो चुका है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार होते ही उनके ८० में से ६० विधायकों को भाजपा ने तोड़ लिया। २० सांसदों को पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया। कल तक जो ममता की तारीफ कर रहे थे, उन्हें एक रात में ममता ‘शैतान’ लगने लगीं, यह आश्चर्य है। कई सांसदों ने भाजपा के आगे सीधे आत्मसमर्पण कर दिया। चिट फंड-नारद जैसे घोटालों में उनके नाम थे। यह सच होने के बावजूद इसी मामले के एक आरोपी शुभेंदु अधिकारी अब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन गए। वास्तव में वे उस मामले में पैसे लेते हुए वैâमरे पर दिखे थे। जिन्होंने बागी सांसदों का नेतृत्व संभाला और सबको एक ‘त्रिपुरी’ पार्टी में विलय कराया, उस डॉ. काकोली घोष दस्तीदार का नाम चिट फंड घोटाले में आया और पैसे लेते हुए उन्हें भी पकड़ा गया। फिर इन तृणमूल सांसदों को डरने का कारण क्या है? इस चिट फंड घोटाले के मुख्य आरोपी ही पश्चिम बंगाल की सत्ता के सूत्रधार हैं। फिर भी तृणमूल के सांसद टूटे और अब नई लूट में शामिल हो गए। मोदी-शाह को लगता है यह बगावत है!
ये सच्चे क्रांतिकारी
शिवसेना के ४० विधायक और १२ सांसद टूटे, तब शिंदे ने क्रांति की, बगावत की, ऐसे ढोल पीटे गए। यह उन क्रांतिकारियों का अपमान है। मंगल पांडे, वासुदेव बलवंत फड़के, तात्या टोपे, झांसी की रानी, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान ने स्वतंत्रता संग्राम में बगावत और क्रांति की। यह क्रांति करने के लिए उन्हें किसी ने पचास करोड़ नहीं पहुंचाए थे। राष्ट्रीय कार्य के लिए उन्होंने बगावत की। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक निधि नहीं देते, समय नहीं देते, इसलिए इन क्रांतिकारियों ने बगावत नहीं की। लेकिन तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र का शिंदे गुट, अजीत पवार गुट, इनकी बगावत का तरीका विचित्र है। भारत को गड्ढे में धकेलने वालों की मदद हो, इसके लिए यह बगावत है। ये सब भाजपा और शिंदे गुट से अंदर ही अंदर मिले हुए थे और हैं। भारत के कुख्यात बेईमान मीर जाफर से ही इनकी तुलना की जा सकती है।
-१८५७ की प्लासी की लड़ाई में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौुला के सेनापति रहे मीर जाफर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव के साथ गुप्त समझौता किया। युद्ध के समय उसने अपनी सेना अचानक रणभूमि से हटा ली। इसके बदले में उसे नवाब बनाने का आश्वासन मिला था। इस एक विश्वासघात के कारण भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की नींव पड़ी। आज भी भारत और कई देशों में ‘मीर जाफर’ मतलब बेईमान यही अर्थ लिया जाता है। मीर जाफर का लालच, महत्वाकांक्षा भारत की गुलामी का कारण बना।
– ज्युडास इस्कैरियट ने अलग क्या किया? बाइबल में यीशु के १२ शिष्यों में से एक ज्युडास ने ३० चांदी के सिक्कों के लिए यीशु को दुश्मनों के हवाले कर दिया था।
– ज्यूलियस सीजर का विश्वस्त मित्र यानी ब्रूटस। उसका खास सलाहकार, लेकिन सीनेट में सीजर की विश्वासघात से हत्या करनेवालों का नेतृत्व ब्रूटस ने किया। ‘‘यू टू ब्रूटस?’’ (ब्रूटस, तुम भी?) यह सीजर का आखिरी वाक्य इतिहास में प्रसिद्ध है। मित्र के विश्वासघात से सीजर का अंत हुआ।
-व्हिडकुन क्विसलिंग दूसरे विश्वयुद्ध में नॉर्वे का नेता था। नाजी जर्मनी से ‘सौदा’ करके उसने अपने देश से गद्दारी की। उसका नाम इतिहास में इतना कलंकित हुआ कि अंग्रेजी में ‘Quisling’ शब्द ही बेईमान, देशद्रोही के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसे कई बेईमानों की वैश्विक सूची में भारत के बेईमानों के नाम जुड़ते जा रहे हैं। थोक में दल-बदल, उसके लिए खर्च किया जाने वाला बेशुमार पैसा, यह एक रहस्य बन गया है। बेईमानी को कानून के दायरे में फिट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, संविधान के चौकीदार एक साथ आते हैं और ब्रूटस की तरह वार करते हैं। ब्रूटस के विश्वासघात को कोई बगावत, क्रांति कह रहा हो तो वह मोदी काल का नया इतिहास है। उसे उन्होंने ही लिखा और अमल में लाया। भारतीय लोकतंत्र को ब्रूटस, क्विसलिंग, मीर जाफर का ग्रहण लग गया है!
बिक गए
शिवसेना का ६०वां स्थापना दिवस समारोह चल रहा था, तभी ६ सांसद बिक गए। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के जन्मशताब्दी वर्ष में भाजपा और एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र में बेईमानी के बीज बोए। सत्ता के नशे की यह पराकाष्ठा है। जिन्हें शिवसेना ने अपने कंधों पर खिलाया, बढ़ाया, बड़ा किया, वे सभी ‘ब्रूटस’ एक साथ हो गए। उन्होंने मां की ही पीठ में खंजर घोंप दिया। घायल मां को खून से लथपथ पड़ी देख ये सभी ब्रूटस विकृत रूप से हंसे और चिल्लाकर बोले, ‘‘ब्रूटस ने विद्रोह किया। ब्रूटस बागी हो गया।’’
महाराष्ट्र ऐसी बगावत पर थूकता है, यह जल्द ही दिखेगा।
