सामना संवाददाता / प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए दुष्कर्म के 38 साल पुराने मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों की कमी को देखते हुए दोनों नामजद आरोपियों को दोषसिद्धि से मुक्त कर बरी कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने आरोपियों की ओर से दाखिल आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए पारित किया।
कुएं में नवजात का शव मिलने से शुरू हुआ था विवाद
विधिक गलियारों में चर्चा का विषय बना यह मामला ललितपुर जिले के मेहरौनी थाना क्षेत्र का है। घटनाक्रम की शुरुआत 3 दिसंबर, 1986 को हुई थी, जब क्षेत्र के एक गांव के कुएं से एक अज्ञात नवजात शिशु का शव बरामद हुआ था। तत्कालीन पुलिस ने इस मामले में अज्ञात के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कर जांच शुरू की थी। हालांकि, बाद में विवेचना के दौरान पुलिस ने पीड़िता और उसकी मां के बयानों के आधार पर देव सिंह और नब्बू नामक व्यक्तियों को नामजद किया। पुलिस ने दोनों के खिलाफ दुष्कर्म, हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल कर दिया था।
निचली अदालत ने सुनाई थी तीन वर्ष की सजा
इस मामले की सुनवाई करते हुए ललितपुर की सत्र न्यायालय ने 13 अक्तूबर, 1988 को अपना फैसला सुनाया था। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें दुष्कर्म का दोषी ठहराया। न्यायालय ने देव सिंह और नब्बू को तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी, जहां तीन दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाई चली।
उम्र के साक्ष्य बने बरी होने का आधार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले के सभी कानूनी और चिकित्सकीय पहलुओं की गहन समीक्षा की। न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित तथ्यों को रेखांकित किया—
पीड़िता की वास्तविक उम्र: चिकित्सकीय परीक्षण और एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार, घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच थी। इसके विपरीत, ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त और ठोस साक्ष्य के अभाव में उसे 15 वर्ष (नाबालिग) मान लिया था।
मूल एफआईआर में आरोप का अभाव: घटना के तुरंत बाद दर्ज कराई गई प्रारंभिक एफआईआर में दुष्कर्म का कोई उल्लेख नहीं था। यह आरोप बाद में विवेचना के दौरान जोड़ा गया।
धारा 164 का बयान: न्यायालय ने पाया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान से स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने थे।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब संबंध सहमति से बने हों और पीड़िता घटना के समय बालिग रही हो, तो दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता। इन विधिक आधारों पर हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के 38 वर्ष पुराने फैसले को निरस्त करते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को बरी करने का आदेश दिया।
