मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : भिक्षावृति-हमारा राष्ट्रीय व्यवसाय

सटायर : भिक्षावृति-हमारा राष्ट्रीय व्यवसाय

डाॅ. रवीन्द्र कुमार

हमारे प्राचीन शास्त्रों में भिक्षावृति बोलचाल की भाषा में बोले तो भीख मांगने का खूब प्रचलन रहा है। आप “भिक्षाम देहि” से अपरिचित नहीं होंगे। दशानन ने सीता का अपहरण इसी वाक्य की सहायता से किया था। दूसरे शब्दों में हर शहर, हर गांव में एक वर्ग ऐसा था, जिसका मुख्य व्यवसाय भीख मांगना होता था। अब आप चाहें तो इसे किसी भी सम्मानजनक नाम दे दें कहलाता यह मूलतः भीख मांगना ही है। आपके गांव, कस्बे शहर में सुबह सुबह भिक्षावृति वाले निकल पड़ते थे। जनता इन्हें कुछ न कुछ भिक्षा देना अपना सामाजिक और धार्मिक कर्तव्य समझती थी। शायद ही कोई भिक्षुक खाली हाथ भेजा जाता था। अनाज, पैसा, जो हो। अब तो भिक्षा वालों ने अपने दफ्तर ही खोल रखे हैं। जहां किसी न किसी छद्म नाम का बोर्ड लगा होगा मगर मुख्य काम भीख का ही होता है। ये भीख मांगने वाले सड़क किनारे, मंदिर-मस्जिद के रूट पर, रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में, हज के दौरान और कुंभ जैसे विशेष अवसरों पर प्रोफेशनल भिखारी अपनी यूनिफ़ाॅर्म पहन जा पहुंचते हैं। उनकी इस काम में अच्छी-ख़ासी आय होती है। आए दिन केस आप भी पढ़ते रहते होंगे कि अमुक भिखारी लाखों छोड़ के मर गया या भिखारी के शहर में महंगे फ्लैट हैं अथवा उसके ऑटो चल रहे हैं। कई भिखारी तो बड़े ठेकेदार टाइप बन जाते हैं बोले तो उनके अंडर में यानि उनके सिंडीकेट में अन्य भिखारियों के भी दल के दल शामिल होते हैं।
इन सब में भारतीय रेलवे का बहुत बड़ा योगदान है। 1853 में जब रेलवे चली थी तब किसी ने सोचा भी न होगा कि भिक्षावृति में रेलवे इतनी महत्ती भूमिका अदा करेगी। भिखारी लोग स्टेशन के आसपास मँडराते रहते हैं। ये उनके परमानेंट टाइप के अड्डे यानि कट्टे (अड्डे का मराठी अनुवाद) होते हैं। मुंबई भीख के लिए बड़ा मुफीद है यूं तो हर वो शहर जहां खूब लोग-बाग हों, भिखारियों की पसंदीदा जगह होती है। इस मामले में वे बिलकुल नेताओं जैसे होते हैं। जैसे नेता को हर शख्स में एक अदद वोटर नज़र आता है वैसे ही भिखारी को हर चलता-फिरता मानुष दाता नज़र आता है। भीड़-भाड़ के मामले में स्टेशन से बेहतर क्या होगा। गाड़ी आ रही है…गाड़ी जा रही है…गाड़ी बुला रही है। बहुत से भिखारी प्रिंट्ड कार्ड सा भी रखते थे और सोचते थे यह एक थोड़ा सम्मानजनक तरीका है। कुछ गीत गा कर, कुछ करुणामयी आवाज निकाल कर। कुछ और तरीके का स्वांग भर के भीख मांगते हैं।
ये भिखारी आपको स्टेशन-स्टेशन मिलेंगे। क्या स्टेशन के बाहर क्या स्टेशन के अंदर। ट्रेन में भी। कोई ट्रेन इनसे अछूती नहीं। ना ही कोई स्टेशन इनसे दूर। मुझे लगता है कई बार ये प्लेटफॉर्म पर आने के लिए किसी न किसी को जरूर भीख देकर ही अंदर आ पाते होंगे। ऑटो-टैक्सी वालों को प्लेटफॉर्म के अंदर आने की मनाही होती है अतः वे सीढ़ियों पर खड़े आपको मिल जाते हैं और आपसे लगभग लगभग सामान छीन कर अपने ऑटो अपनी टैक्सी में बिठाना चाहते हैं ताकि आपको किसी सुनसान जगह पर जाकर लूटा जा सके और लूटा नहीं जा सके तो किराये के रूप में ही छीन लो जितना हो सके।
पता नहीं क्यों मगर स्टेशन का इलाका भीख मांगने वालों में बहुत लोकप्रिय होता है। एक कारण तो यह होगा की 24 घंटे स्टेशन पर रौनक-मेला रहता है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई छोड़ने आया है तो कोई लेने आया है। यह जमावड़ा ही तो भिखारी का भिक्षादान केंद्र है। वे बिंदास आपको जनरल डिब्बे में मिलेंगे, रिजर्व डिब्बे में मिलेंगे। फर्स्ट क्लास में मिलेंगे। सेकंड क्लास में मिलेंगे। अब तो स्वांग के साथ साथ टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलते भी मिल जाते हैं। दरअसल, ये उनका व्यवसाय है इसके लिए जो भी समान लगता है जैसे यूनिफ़ाॅर्म, अस्पताल की पट्टी, पलस्तर, सहारा लेकर चलने को लाठी। उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी करना। अनेकानेक प्राॅप्स हैं इस काम में। आपका थोड़ा मरा-गिरा सुकड़ू सा होना जरूरी हैं, अगर आप जिस्मानी तौर पर मजबूत कद-काठी के हैं तो आसानी से भीख नहीं मिलती। कुछ और औटपाए करने पड़ते हैं। सन् सत्तर के दशक की बात है मेरे मित्र ने कॉलेज के बाहर एक भिखारी को कहा छुट्टे नहीं हैं तो उसने पूछ लिया कितने का नोट है? मित्र ने कहा सौ का नोट है! उसने बैठ कर अपनी पगड़ी में से सौ के खुले दे दिये, तब सौ रुपये बहुत होते थे।
यह एरिया किन्ही कारणोंवश सरकार से वैसी मान्यता और सुविधाएं नहीं पा रहा जैसी कि ये डिजर्व करता है। मसलन फौरन से पेश्तर भिखारियों को बाकायदा लाइसेन्स दिये जाएँ ताकि उनके आपस में क्षेत्राधिकार के झगड़े न हों। बागपत में किन्नर लोग की शिकायत है सोनीपत के किन्नर आ कर हमारे बिजनिस में हिस्सा-बांट कर रहे हैं। इसी तरह जब क्षेत्राधिकार तय हो जाएँगे तो यह समस्या नहीं रह जाएगी। उनसे आयकर भी लिया जा सकता है। उनके भीख मांगने के टाइमिंग्स भी रेगुलेट किए जा सकते हैं। वे हमेशा अपने पास आई.डी. कार्ड रखेंगे। सरकार बी.डी.ओ. नियुक्त करे भिखारी डवलपमेंट ऑफिसर। इस मद को समवर्ती सूची (कनकरंट लिस्ट) में रखा जाये ताकि राज्य सरकार इसकी देखा देखी अपने नियम – अधिनियम बना सके। कुछ बरस बाद रिव्यू करके इनको इजाजत दी जाये कि अन्य देशों के भिखारियों के साथ ये जाॅइंट वेंचर कर सकें और अपने आई.पी.ओ. जारी कर सकें दूसरे शब्दों में इसे फुल फ्लैज्ड इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। भिखारियों के लिये पी.एफ., ग्रेच्युटी और पेंशन पर भी विचार किया जाये। देखें इन्हें इसके लिए अपनी कोई भिखारी पार्टी न बनानी पड़े। रेलवे तो सबसे पहले इनके साथ फिफ़्टी फिफ़्टी की पार्टनरशिप पर पार्टनरशिप डीड साइन कर ले। ये सॉफ्ट स्किल आपको ढूंढे नहीं मिलेगा। राजस्व की प्राप्ति होगी सो अलग। भिक्षाम देहि ?

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