के.पी. मलिक
`विश्वगुरु’ पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का शायद सबसे चर्चित शब्द बन चुका है या बना दिया गया है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक ऐसी राष्ट्रीय आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें भारत आर्थिक, सामरिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक शक्ति बनकर दुनिया का नेतृत्व करे। अच्छी बात है इसमें कोई बुराई नहीं; हर राष्ट्र को बड़े सपने देखने चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में सपनों की असली परीक्षा भाषणों से नहीं, बल्कि आंकड़ों से होती है। और यदि आंकड़े लगातार ऐसे सवाल खड़े करें कि जिनका जवाब नारों से नहीं दिया जा सकता, तो समस्या विपक्ष की आलोचना नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की होती है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता रहा है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल भुगतान तक अनेक उपलब्धियां देश के लिए गर्व का विषय हैं। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यदि प्रति व्यक्ति आय अभी भी बड़ी आबादी के लिए सीमित है, यदि राज्यों के बीच आय का अंतर कई गुना है, यदि लाखों युवा बेहतर अवसरों के लिए पलायन कर रहे हैं, और यदि अंतर्राष्ट्रीय सूचकांकों में भारत की स्थिति कई क्षेत्रों में अपेक्षा से कमजोर दिखाई देती है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या विकास का लाभ समान रूप से सब तक पहुंच रहा है?
भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास उसकी आर्थिक असमानता है। एक तरफ ऐसे महानगर हैं, जहां औसत आय कई लाख रुपए सालाना तक पहुंच जाती है, तो दूसरी ओर ऐसे राज्य भी हैं जहां बड़ी आबादी की वार्षिक आय उस स्तर तक भी नहीं पहुंचती, जिसे सम्मानजनक जीवन का आधार माना जा सके। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहर वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े भारत की तस्वीर पेश करते हैं, जबकि बिहार, झारखंड, ओडिशा और देश के कई पिछड़े क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी अवसरों के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रश्न यह नहीं कि कुछ राज्य आगे क्यों बढ़े; प्रश्न यह है कि बाकी इतने पीछे क्यों रह गए।
यदि किसी देश में एक नागरिक औसतन पचास हजार रुपए महीना कमाता हो और दूसरे राज्य का नागरिक आठ हजार रुपए महीना भी मुश्किल से कमा पाए, तो यह केवल आर्थिक अंतर नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता का जीता जागता प्रमाण है। ऐसे अंतर लंबे समय में सामाजिक तनाव, बड़े पैमाने पर पलायन और क्षेत्रीय असंतुलन को जन्म देते हैं। एक और महत्वपूर्ण प्रश्न आंकड़ों की गुणवत्ता और उपलब्धता का है। सार्वजनिक नीति का आधार विश्वसनीय डेटा होता है। यदि जनगणना समय पर न हो, यदि कई योजनाएं पुराने जनसंख्या आंकड़ों पर चलती रहें, यदि नीति-निर्माण पुराने आधारों पर निर्भर हो, तो संसाधनों का न्यायसंगत वितरण प्रभावित हो सकता है। विकसित भारत का लक्ष्य केवल निवेश और बुनियादी ढांचे से नहीं, बल्कि अद्यतन और भरोसेमंद आंकड़ों से भी जुड़ा है। भारत में पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानना भी पासपोर्ट की वैश्विक रैंकिंग को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि किसी पासपोर्ट की रैंकिंग मुख्यत: यह दर्शाती है कि उसके धारक को कितने देशों में बिना वीजा या आसान वीजा व्यवस्था के साथ प्रवेश मिल सकता है। यह किसी नागरिक की व्यक्तिगत क्षमता या देश की संपूर्ण शक्ति का प्रत्यक्ष पैमाना नहीं है। फिर भी, यह अंतर्राष्ट्रीय विश्वास, कूटनीतिक संबंधों और वैश्विक गतिशीलता का एक संकेतक अवश्य माना जाता है। इसलिए यदि इस क्षेत्र में भारत अपेक्षित स्थान पर नहीं है, तो उसे केवल खारिज करने के बजाय सुधार की दृष्टि से देखना चाहिए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह असहज प्रश्न पूछने की अनुमति देता है। क्या सरकार आलोचना से असहज होती है, या उन आंकड़ों से जो नीति की कमियों की ओर संकेत करते हैं? यह प्रश्न किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। हर लोकतांत्रिक सरकार के सामने यह चुनौती रहती है कि वह उपलब्धियों के साथ-साथ कमियों को भी स्वीकार करे। क्योंकि जो सरकार केवल सफलता के आंकड़े दिखाती है और असुविधाजनक आंकड़ों को नजरअंदाज करती है, वह सुधार का अवसर भी खो देती है।
बहरहाल, भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आर्थिक विकास की गति नहीं, बल्कि उसके वितरण की गुणवत्ता है। यदि विकास का लाभ कुछ राज्यों, कुछ शहरों और कुछ वर्गों तक सीमित रह जाए, तो `विकसित भारत’ का सपना अधूरा रह जाएगा। विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल वैश्विक मंचों पर प्रभावशाली भाषण देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि देश का सबसे गरीब नागरिक सम्मानजनक आय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और समान अवसर प्राप्त कर सके। विश्वगुरु का दर्जा घोषणाओं से नहीं मिलता, बल्कि संस्थाओं की मजबूती, विश्वसनीय आंकड़ों समान अवसरों और नागरिकों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार से मिलता है। यदि भारत को २०४७ तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे नारों से अधिक डेटा पर, प्रचार से अधिक पारदर्शिता पर और दावों से अधिक परिणामों पर भरोसा करना होगा। आखिरकार, इतिहास में वही राष्ट्र स्थायी नेतृत्व करते हैं जो अपनी कमियों को छिपाते नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार कर सुधारते हैं। आंकड़े सरकार के विरोधी नहीं होते; वे शासन का आईना होते हैं। और जो राष्ट्र आईना तोड़ देता है, वह अपना चेहरा नहीं बदलता सिर्फ सच देखने की क्षमता खो देता है।
-डिजिटल चमक बनाम जमीनी हकीकत
-जनता के टैक्स का गोलमाल हिसाब-किताब!
सरकारी दफ्तरों के चमचमाते डिजिटल डैशबोर्ड जब किसी विकास परियोजना के लक्ष्य को १०० फीसदी पूरा दिखाते हैं, तो कागजों पर तरक्की की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर उभरती है। प्रेस कॉन्प्रâेंस में उपलब्धियों के कसीदे पढ़े जाते हैं, लेकिन जब वही आम नागरिक जमीन पर अस्पताल, स्कूल या पानी की पाइपलाइन देखने पहुंचता है, तो वहां अक्सर अधूरा ढांचा या खाली प्लॉट मिलता है। यहीं से जन्म लेती है भारत की `पैंâटम इकॉनमी’, एक ऐसी आभासी अर्थव्यवस्था जहां कागजी विकास देश के वास्तविक विकास को ओवरलैप कर जाता है।
करदाता सरकार को टैक्स इस उम्मीद में देता है कि उसे सुरक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन जब बजट कानूनी तौर पर पास हो, भुगतान भी हो जाए और नतीजा `सिफर’ रहे, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता की `कानूनी डवैâती’ बन जाता है। हालिया सीएजी रिपोर्ट और आरटीआई से सामने आए मुख्य उदाहरण इस कड़वे सच को उजागर करते हैं।
कागजी विकास के उदाहरण
पहली विफलता फाइलों में दौड़ते अस्पतालों और अटके एम्स के रूप में दिखती है। कागजों पर जो अस्पताल १०० बेड की क्षमता के साथ तैयार दिखते हैं, वे असल में सालों तक अधूरे रहते हैं। बिहार में प्रस्तावित एम्स जैसी विशाल योजनाएं प्रशासनिक सुस्ती के कारण शुरुआती स्तर से आगे नहीं बढ़ पातीं। इसका नुकसान सिर्फ पैसों की बर्बादी नहीं, बल्कि उन मरीजों की जान है जो इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। दूसरी विफलता `स्किल इंडिया’ के घोस्ट संस्थान हैं। युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली कौशल विकास योजनाओं में कागज पर लाखों युवाओं को प्रशिक्षित दिखा दिया जाता है। लेकिन जब जमीन पर फर्जी संस्थानों और फर्जी हाजिरी का सच सामने आता है, तो `डेटा’ और `रोजगार की हकीकत’ दो अलग-अलग ध्रुव नजर आते हैं।
तीसरी बड़ी समस्या जल जीवन और पाइपलाइन का छलावा है। गांवों में पाइप बिछा देने को ही लक्ष्य की प्राप्ति मान लिया जाता है, भले ही उसमें पानी की एक बूंद न टपके। घटिया निर्माण सामग्री और कागजी गुणवत्ता प्रमाणपत्रों के कारण अंतत: नुकसान उसी गरीब का होता है जिसके नाम पर योजना बनाई गई थी।
चौथी चुनौती आशियाने पर साइबर डवैâती के रूप में सामने आई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों को मिलने वाली राशि में तकनीकी खामियों और पहचान की चोरी (साइबर प्रâॉड) के कारण सेंध लग रही है। डिजिटल सुरक्षा की यह चूक सीधे तौर पर सामाजिक न्याय पर प्रहार है।
समस्या का मूल
आज की प्रशासनिक व्यवस्था केवल ऐप्स और पोर्टल्स के आंकड़ों को ही सफलता का पैमाना मान चुकी है। इस `डैशबोर्ड गवर्नेंस’ ने जमीनी हकीकत से अफसरों का नाता तोड़ दिया है। जब तक हर डिजिटल आंकड़े का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट नहीं होगा, यह भ्रम टूट नहीं सकता।
जवाबदेही का नया मॉडल
देश को अब नई घोषणाओं की नहीं, बल्कि एक कड़े जवाबदेही मॉडल की जरूरत है। इसके लिए सबसे पहले ड्रोन और जियो-टैगिंग के जरिए योजनाओं की लाइव मॉनिटरिंग और रियल-टाइम थर्ड पार्टी वेरिफिकेशन किया जाए। इसके साथ ही, ठेकेदारों और एजेंसियों को भुगतान कागजी फाइलों के आधार पर नहीं, बल्कि मौके पर तैयार ढांचे की वास्तविक भौतिक प्रगति को देखकर ही किया जाना चाहिए। अंत में, लापरवाही या वित्तीय हेरफेर साबित होने पर दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर केवल विभागीय कार्रवाई न हो, बल्कि उनकी निजी संपत्ति से रिकवरी का आर्थिक दंड भी तय किया जाए।
(लेखक `दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
