मनमोहन सिंह
अल्गोरिदम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के दम पर पूरी दुनिया के इंसानी व्यवहार को नियंत्रित करने का दावा करनेवाली मेटा जैसी ट्रिलियन-डॉलर कंपनियां आज एक बार फिर कटघरे में हैं। इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े कथित आपत्तिजनक विज्ञापनों सीएसएएम (चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल) के सामने आने के बाद भारत सरकार के कड़े रुख और नोटिस ने इन कंपनियों के दावों की हवा निकाल दी है। हमेशा की तरह मेटा ने एक रटा-रटाया ‘सफाईनामा’ जारी करते हुए दावा किया कि उन्होंने वर्ष २०२६ में अब तक ४० लाख संदिग्ध अकाउंट्स हटाए हैं। लेकिन यह कॉरपोरेट पीआर स्टंट उन गंभीर सवालों को नहीं छिपा सकता, जो सीधे तौर पर इनके इरादों और तंत्र पर चोट करते हैं। आखिर देश की संप्रभु सरकार को इन महा-कंपनियों को इस हद तक हड़काने और तलब करने की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब साफ है, इनकी लापरवाही अब बर्दाश्त की सीमा पार कर चुकी है। यहां सरकार के तंत्र पर भी सवाल उठता है कि ऐसी भयंकर सामग्री पर सरकार का ध्यान क्यों नहीं गया, जबकि सरकार के पास इसके लिए अपना खुद का एक मंत्रालय है?
खोखली दलीलें
तकनीकी रूप से देखें तो मेटा की यह दलील पूरी तरह खोखली साबित होती है कि यह कंटेंट उनके सिस्टम से ‘अनजाने’ में बच निकला। जब बात किसी यूजर के राजनीतिक झुकाव को ट्रैक करने, उसकी निजी बातचीत और सर्च हिस्ट्री से डेटा चुराकर नैनो-सेकंड में शॉपिंग विज्ञापन परोसने (हाइपर टारगेटेड एडवरटाइजमेंट) की होती है तो इन कंपनियों का ‘प्रेडिक्टिव अल्गोरिदम’ और कंप्यूटर विजन मैकेनिज्म त्रुटिहीन काम करता है। फिर बच्चों के यौन शोषण जैसे घिनौने और संवेदनशील अपराध से जुड़े विज्ञापन इनकी इस तथाकथित ‘विश्वस्तरीय’ सर्विलांस प्रणाली की नजरों से वैâसे बच गए?
क्या इसे वाकई तकनीकी चूक माना जाए या फिर विज्ञापन से आनेवाले राजस्व के लालच में किया गया ‘जानबूझकर अंधापन’? सच तो यह है कि इन कंपनियों का पूरा बिजनेस मॉडल ही ‘अटेंशन इकोनॉमी’ और ‘यूजर एंगेजमेंट’ पर टिका है। मुनाफे की इस अंधी दौड़ में हर क्लिक, चाहे वह कितनी भी विकृत और अमानवीय मानसिकता से आ रहा हो, कंपनियों के लिए सिर्फ एक नंबर और रेवेन्यू का जरिया है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह इन टेक कंपनियों के बिजनेस मॉडल का ही एक घिनौना और संवेदनहीन रूप है, जहां नैतिक जिम्मेदारी को मुनाफे के बहीखाते में दफन कर दिया गया है।
बर्बाद हुए बचपन की भरपाई!
यहां सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह उठता है कि अगर चाइल्ड एब्यूज के ये खौफनाक मामले तीसरे पक्ष द्वारा संज्ञान में न लाए जाते तो क्या मेटा इन्हें अपने आप कभी हटाता? क्या मेटा वाकई इस बात से अनजान था कि उसके प्लेटफॉर्म पर मासूमों के साथ खिलवाड़ हो रहा है? अगर कंपनी कहे कि उसे जानकारी नहीं थी तो तकनीकी रूप से यह सवाल है कि क्यों नहीं थी? ऐसा तो व्यावहारिक रूप से मुमकिन ही नहीं है कि दुनिया की सबसे हाईटेक कंपनियों की अत्याधुनिक हैश-मैचिंग (फोटो डीएनए) और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम की नजरों से इतनी बड़ी और घिनौनी चीज छिप जाए। जो टेक-दिग्गज इंसानी दिमाग को पढ़ने का दावा करते हैं, वे अपने ही प्लेटफॉर्म पर खुद प्रमोट किए जा रहे पेड विज्ञापनों से अनजान होने का ढोंग वैâसे कर सकते हैं?
एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि इस गंभीर अपराध की वेदी पर जो मासूम बच्चे चढ़े, क्या मेटा के पास उनका कोई डेटा है? क्या उन बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक शोषण का हिसाब इन कंपनियों के पास है? क्या लाखों अकाउंट्स ब्लॉक कर देने के आंकड़ों से उन मासूमों के बर्बाद हुए बचपन की भरपाई की जा सकती है?
कंपनियां तकनीकी जटिलताओं का बहाना बनाकर इस जघन्य अपराध में अपनी सह-अपराधी की भूमिका से हाथ नहीं खींच सकतीं। आज मेटा सुरक्षा के दावे कर रही है, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि भविष्य में ऐसी गलतियां दोबारा नहीं होंगी? इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसी चूक पकड़ी जाती है, ये टेक दिग्गज ‘हम बदलाव कर रहे हैं’ का एक्सक्यूज देते हैं और कुछ समय बाद एक नए विवाद के साथ फिर सामने आते हैं। इनका यह रवैया ढाक के तीन पात जैसा है।
आपराधिक मुकदमे क्यों नहीं?
यहां सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर इन कंपनियों और इनके आकाओं को हर बार क्यों बख्श दिया जाता है? जब भारत में बच्चों के संरक्षण के लिए ‘पोक्सो एक्ट’ जैसा बेहद सख्त और गैर-जमानती कानून मौजूद है तो इसका फंदा इन टेक-दिग्गजों के गले तक क्यों नहीं पहुंचता? पोक्सो अधिनियम के तहत बच्चों से जुड़े किसी भी प्रकार के यौन शोषण या अश्लील सामग्री को स्टोर करना, प्रदर्शित करना या उसका प्रसार करना एक गंभीर और दंडनीय अपराध है। ऐसे में, यदि मेटा का प्लेटफॉर्म ऐसे विज्ञापनों को न केवल होस्ट करता है, बल्कि अपने अल्गोरिदम के जरिए उन्हें प्रमोट भी करता है तो कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट के तहत सीधे मामले दर्ज क्यों नहीं किए जाने चाहिए?
इन कंपनियों को अब तक आईटी एक्ट की धारा ७९ के तहत मिलनेवाला ‘सेफ हार्बर’ (सुरक्षित कवच) तुरंत खत्म होना चाहिए। जब आप विज्ञापन से पैसे कमा रहे हैं तो आप सिर्फ ‘डाकिया’ या ‘इंटरमीडियरी’ नहीं रह जाते, आप उस पब्लिशर की भूमिका में आ जाते हैं जो मुनाफे के लिए सौदा कर रहा है। इसलिए इन कंपनियों के भारत में बैठे कंट्री हेड्स, नोडल ऑफिसर्स और वैश्विक सीईओ तक पर पोक्सो कानून की गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज होने चाहिए।
अब समय केवल नोटिस भेजने या स्पष्टीकरण मांगने का नहीं है, बल्कि इन्हें सीधे तौर पर कानून के कटघरे में खड़ा करने का है। भारतीय कानून व्यवस्था के अंतर्गत और वैश्विक न्याय व्यवस्था (जैसे यूरोपीय संघ के कड़े डिजिटल सेवा कानून – डीएसए) के अंतर्गत इन कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों पर सीधे गैर-जमानती धाराओं के तहत मुकदमा चलना चाहिए। इन पर अरबों डॉलर का ऐसा दंडात्मक जुर्माना लगाया जाना चाहिए, जो इनके बिजनेस को हिला कर रख दे। जब तक इन टेक-दिग्गजों के बोर्डरूम में बैठे अधिकारियों को जेल की सलाखों का सीधा डर नहीं होगा, तब तक इनकी नैतिक जिम्मेदारी कभी नहीं जागेगी। तकनीक अगर हमारे समाज के सबसे मासूम और कमजोर हिस्से, यानी हमारे बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकती तो ऐसी अनियंत्रित और संवेदनहीन तकनीक को जड़ से उखाड़ फेंकने का समय आ गया है।
