भरतकुमार सोलंकी
मुंबई
हमारे यहां अक्सर कहा जाता है-‘बेटा बाप की पहचान है।’ लेकिन तकनीक और आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में प्रश्न उल्टा भी पूछा जा सकता है-‘बाप की पहचान क्या है?’
Telegram के संस्थापक पावेल ड्यूरोव ने जब सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने अपनी अरबों डॉलर की संपत्ति के लिए वसीयत तैयार कर ली है और उनकी संपत्ति उनके सभी जैविक बच्चों में समान रूप से बांटी जाएगी, तब दुनिया का ध्यान केवल उनकी दौलत पर नहीं, बल्कि ‘पिता’ की बदलती परिभाषा पर भी गया। उन्होंने यह भी बताया कि उनके कुछ बच्चे व्यक्तिगत संबंधों से जन्मे हैं, जबकि वर्षों तक स्पर्म डोनर रहने के कारण विभिन्न देशों में उनके अनेक अन्य जैविक बच्चे भी हैं। भारतीय परिवार व्यवस्था में यह बात सहज स्वीकार करना कठिन लग सकती है, क्योंकि यहां पिता का अर्थ केवल जन्म देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह है जो उंगली पकड़कर चलना सिखाए, संस्कार दे, पढ़ाए-लिखाए और जीवनभर साथ निभाए। लेकिन आधुनिक चिकित्सा और कानून तीन अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करते हैं-जैविक पिता, कानूनी पिता और सामाजिक पिता।
जैविक पिता वह, जिसके डीएनए से बच्चे का जन्म हुआ। कानूनी पिता वह, जिसे कानून बच्चे के अधिकारों और जिम्मेदारियों का संरक्षक मानता है। सामाजिक पिता वह, जो बच्चे के जीवन में वास्तव में पिता की भूमिका निभाता है। कई बार ये तीनों एक ही व्यक्ति होते हैं, तो कई बार तीनों अलग-अलग। ड्यूरोव की वसीयत का सबसे रोचक पक्ष यह है कि उन्होंने जैविक संबंधों को आर्थिक उत्तराधिकार से जोड़ा। उनके अनुसार, चाहे संतान व्यक्तिगत संबंधों से जन्मी हो या अधिकृत चिकित्सीय प्रक्रिया के तहत शुक्राणु दान से, यदि वह उनकी जैविक संतान है तो विरासत में उसका अधिकार समान होना चाहिए। यह सोच कई देशों में उत्तराधिकार, परिवार और नैतिकता पर नई बहस को जन्म दे रही है।
भारत में भी IVF, IUI और अन्य सहायक प्रजनन तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में यहां भी ऐसे प्रश्न अधिक सामने आ सकते हैं-जैविक अधिकार क्या हैं, कानूनी अधिकार किसके हैं और भावनात्मक जिम्मेदारी कौन निभाएगा? इसलिए वसीयत अब केवल करोड़पतियों का दस्तावेज नहीं रही; यह परिवार में भविष्य के विवादों को रोकने का एक महत्वपूर्ण साधन बनती जा रही है।
निवेश की दुनिया में हम हमेशा कहते हैं कि केवल संपत्ति बनाना पर्याप्त नहीं, उसका सुविचारित उत्तराधिकार भी उतना ही आवश्यक है। करोड़ों की संपत्ति यदि स्पष्ट वसीयत के बिना छोड़ी जाए तो वह परिवार को समृद्ध करने के बजाय वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगवा सकती है। ड्यूरोव का जीवन सभी के लिए आदर्श हो, यह आवश्यक नहीं। उनकी निजी पसंद पर मतभेद भी हो सकते हैं। लेकिन एक सीख अवश्य है-दुनिया बदल रही है। परिवार की परिभाषा बदल रही है, चिकित्सा नई संभावनाएं खोल रही है और कानून नई परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल रहा है। ऐसे समय में धन का सबसे समझदार निवेश केवल संपत्ति बनाना नहीं, बल्कि उसके उत्तराधिकार की स्पष्ट योजना बनाना भी है। क्योंकि विरासत केवल धन की नहीं होती, स्पष्ट सोच की भी होती है।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)
