मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : मुंढे का डंडा या सिस्टम की आखिरी चेतावनी?

अंदर की बात : मुंढे का डंडा या सिस्टम की आखिरी चेतावनी?

राजन पारकर

अन्न और औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने जिस तरह मिलावटखोरों पर शिकंजा कसा है, उससे मंत्रालय के गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक हलकों में कानाफूसी है कि वर्षों से जिन लोगों की ‘कमाई’ स्कूलों के भोजन और ठेकों से चल रही थी, उनकी नींद उड़ चुकी है। सूत्रों के अनुसार, अब निशाना केवल होटल और मिठाई की दुकानें नहीं, बल्कि स्कूलों की वैंâटीन और मध्याह्न भोजन योजना भी है। सवाल यह है कि अगर बच्चों की थाली में कीड़े और सड़ा हुआ खाना वर्षों से पहुंच रहा था तो अब तक जिम्मेदार अधिकारी किसकी सेवा कर रहे थे? चर्चा यह भी है कि कुछ शिक्षा अधिकारियों और ठेकेदारों की फाइलें खुल सकती हैं। कई बचत समूहों और सप्लायरों की जांच होनेवाली है। यदि ऐसा हुआ तो केवल मिलावटखोर ही नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण देनेवाले भी बेनकाब होंगे। असल सवाल मुंढे नहीं हैं… सवाल यह है कि इतने साल तक सरकार सो क्यों रही थी? अगर एक अधिकारी आते ही पूरा तंत्र हिल जाता है तो इसका मतलब बीमारी बहुत गंभीर है।
डर की दस्तक, सिस्टम की सच्चाई और जनता की कीमत!
महाराष्ट्र में इन दिनों तीन तस्वीरें एक साथ दिखाई दे रही हैं। एक तरफ मिलावटखोरों और भ्रष्ट तंत्र पर प्रशासन की सख्ती का डंका बज रहा है, दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और तीसरी ओर प्रकृति सरकारों की तैयारियों की पोल खोलने के लिए तैयार खड़ी है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आनेवाले दिनों में कई विभागों की जवाबदेही तय हो सकती है। सूत्रों के अनुसार, कुछ अधिकारियों की कुर्सियां भी खतरे में हैं। जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।
कांदिवली की बेटी… और कानून का खामोश चेहरा
मुंबई एक बार फिर शर्मसार हुई। एकतरफा प्यार के नाम पर एक मासूम छात्रा की बेरहमी से हत्या कर दी गई। पुलिस ने आरोपी पकड़ लिया, लेकिन क्या केवल गिरफ्तारी से समाज सुरक्षित हो जाएगा? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार के तमाम दावों की हकीकत लगातार सामने आ रही है। हर घटना के बाद वही बयान, वही जांच और वही संवेदनाएं। सूत्रों के अनुसार, इस घटना के बाद पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा हो सकती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आरोपी के व्यवहार की पहले कोई शिकायत थी? अगर थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जब बेटियां स्कूल से लौटते समय भी सुरक्षित नहीं हैं, तब सत्ता के मंचों से कानून-व्यवस्था पर तालियां बजाने वालों को आईना देखना चाहिए। ‘शासन की असली परीक्षा भाषणों से नहीं, नागरिक की सुरक्षा से होती है।’ आज मुंबई उसी परीक्षा में असफल दिखाई दे रही है।
बारिश नहीं… सरकार की तैयारी बह रही है
मौसम विभाग ने बीस राज्यों में हाई अलर्ट जारी किया है। महाराष्ट्र पहले से ही बारिश की मार झेल रहा है। हर साल की तरह इस बार भी सड़कें डूबीं, पुल बंद हुए और प्रशासन अलर्ट के पोस्टर चिपकाने में व्यस्त दिखाई दिया। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में आपदा प्रबंधन की समीक्षा बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि हालात बिगड़े तो कुछ विभागों की जवाबदेही तय की जा सकती है। सवाल यह है कि हर साल करोड़ों रुपए नालों की सफाई, बाढ़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन पर खर्च होते हैं, फिर पहली तेज बारिश में ही पूरा सिस्टम क्यों डूब जाता है? चर्चा यह भी है कि कई जिलों में तैयारियों की पोल खुलने वाली है। अगर प्रशासन केवल प्रेस कॉन्प्रâेंस से बारिश रोक सकता तो शायद जनता को नावों की जरूरत नहीं पड़ती। प्रकृति हर साल परीक्षा लेती है, लेकिन सरकार हर साल फेल होने का नया रिकॉर्ड बना देती है। महाराष्ट्र में अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि जनता भी जवाब मांग रही है। एक ओर मुंढे जैसे अधिकारी व्यवस्था को झकझोर रहे हैं, दूसरी ओर अपराध और अव्यवस्था सरकार की उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आनेवाले दिनों में कई पैâसले होंगे, कुछ चेहरों की कुर्सियां हिलेंगी और कई फाइलें खुलेंगी। मगर जनता का सवाल वही रहेगा, क्या व्यवस्था बदलेगी या केवल चेहरे?

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